वो डायरी निकाल के रखना कभी कभी

वो डायरी निकाल के रखना कभी कभी
सूखे गुलाब उसमें से चुनना कभी कभी

छा मन पे जाएंगी वही भीनी सी खुशबुएं
उन चिट्ठियों को खोल के पढ़ना कभी कभी

इन यादों की तपन में झुलस जाना तुम नहीं
अच्छा है आँसुओं में भी बहना कभी कभी

नज़रों में जी उठेंगे तुम्हारे ही गुजरे पल
तुम शहर अपने लौट के मिलना कभी कभी

गुस्ताखियां मुआफ़ तेरी होंगी, कहके ये
मन को खुला भी छोड़ के रखना कभी कभी

बातें ये प्यार की किसी से कह न पाओगे
पर जाके छत पे चाँद से कहना कभी कभी

मिल जाएगा सुकून जरा दिल को ‘अर्चना’
तन्हाइयों से दोस्ती करना कभी कभी

02-12-2019
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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