वो क्या कहेगी

आरजू दिल में है उससे मिलने की
जाने कब ये आरजू पूरी होगी
कौन जाने मेरी किस्मत में होगी वो
या मेरी ख्वायिश अधूरी होगी।।

उसकी वो गहरी आंखे तो कहती है
खोकर मुझमें हो जाओ मदहोश
मेरी आंखों में भी प्यार है उसके लिए
सोचता हूं बस, वो क्या कहेगी।।

उसकी वो खुशबू मुझे खींचती है
कस्तूरी मृग की तरह अपनी ओर
मेरी सांसे भी पहचान लेती है उसे
सोचता हूं अब, वो क्या कहेगी।।

उसकी पलकें कहती है मुझसे
पलकों पर बिठा लो इसे
यही तो मेरी आरजू भी है
सोचता हूं फिर, वो क्या कहेगी।।

कभी कभी सोचता हूं कि मैं
भुला दूं अपने दिल की चाहत
भूल जाऊं उसे किसी तरह
तभी मिलेगी मेरे दिल को राहत।।

फिर ख्याल आता है उसकी जुल्फों का
जो कहती है संवारो अपने हाथों से मुझे
मेरे हाथ भी बैचैन है इसके लिए
फिर सोचता हूं, वो क्या कहेगी।।

होगा क्या जब वो ना हां कहेगी
और ना ही मुझे ना कह पाएगी
मेरे दिल में इस पर उलझन सी है
जो दूर होगी तब जब वो हां कहेगी।।

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