कविता · Reading time: 1 minute

वो केवल है ईन्सान।

राकेश सितारे आसमान
ब्रह्माण्ड करे जिसका गुणगान ।
असम्भव नहीं कुछ भी जिसको
प्रकृति का जो है अभिमान ।

सर्प सीपियाँ मगर अगर पशु पक्षी
जिस हित हुआ सब का उत्थान ।
नहीं अछूता कुछ भी जिससे
ताल पाताल नख नभ सुनसान ।

आदि अनागत विद्यमान
हर काल का जो निगहबान
तीव्र बुद्धि ससत बलवान
तत्व का जिसे सर्वस्व ज्ञान ।

ढूँढ ले जो दानव में मानवता
मानवता को माने जो भगवान ।
महा मही की है जो सन्तान
युगोंयुगांतर वो केवल है इनसान ।

देवेन्द्र दहिया- अम्बर
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शब्दार्थ ……
नभ सुनसान – अन्तरिक्ष, शुन्य;
सर्प- रैपटाईलस;
सीपियाँ- जलीय जीव;
मगर- जल थल दोनो में रहनेवाले जीव जैसे मगरमच्छ आदि;
अगर – वृक्ष ;
आदि – प्राचीन;
अनागत – भविष्य ;
विद्यमान – वर्तमान ;
ससत – ताकतवर ;
मही – पृथ्वी

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