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वो आठ दोहे ।

रकमिश सुल्तानपुरी

रकमिश सुल्तानपुरी

दोहे

February 8, 2017

जीवन नौका जग जलधि, आशा की पतवार ।
भांप भवँर में डगमगी, ,,,,,,,चुप है खेवनहार ।1।

दिन है सच का आवरण , रजनी झूठ प्रतीक ।
सुबह शाम है दोगले ,,,, लगते सबको नीक ।।2।।

वाणी में जिनके गरल , ,,,,उर में पर सन्ताप ।।
क्रोधी, तुनकमिजाज, हम ,,दुर्जन अपनेआप ।।3

दम्भ, कुकर्मी , नीचता,,,,,,,,दुर्जन की पहचान ।।
मुख है विष की पोटली,,,अरि भुजंग सम जान ।।4

चली योजना सालभर,, हुआ अथक प्रयास ।
देख गरीबों की दशा ,,,,,रोता रहा विकास ।।5

आँख मिचौली खेलते ,,,,,,झोंक रहे है धूल ।
हुआ असर हर गाँव में ,,उन्नति के प्रतिकूल ।। 6

दुर्दिन दुःख दारुण यथा, खास एक मलमास ।।
जीवन ही उम्मीद है ,,,, ,,,होना नही उदास ।।7

प्रेम गगन बिच ढूढ़ती, आशाओं के रंग ।
जीवन डोर समेटती , उड़ती रहे पतंग ।। 8

©राम केश मिश्र

Author
रकमिश सुल्तानपुरी
रकमिश सुल्तानपुरी मैं भदैयां ,सुल्तानपुर ,उत्तर प्रदेश से हूँ । मैं ग़ज़ल लेखन के साथ साथ कविता , गीत ,नवगीत देशभक्ति गीत, फिल्मी गीत ,भोजपुरी गीत , दोहे हाइकू, पिरामिड ,कुण्डलिया,आदि पद्य की लगभग समस्त विधाएँ लिखता रहा हूं ।... Read more
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