Nov 16, 2018 · कविता

वो अब बूढ़ी हो रही है

मुझे अब फिक्र होने लगी है उसकी जिसने ताउम्र मेरी फिक्र की,
मेरे देर से घर लौटने से लेकर देर से सोने तक की फिक्र,
मेरे एक रोटी कम खाने की फिक्र, मेरे हर छोटे छोटे बहाने की फिक्र,
जिसने गुज़ारी है उम्र इसी में, वो अब बूढ़ी हो रही है।

जिसका नाम जिन्दगी में सबसे पहले जुबां पर आया और बोलना सीखा,
जिसका नाम हर दुख और दर्द में यकायक आ गया ज़ुबान पे वो माँ,
जिसके हाथो को पकड़ मैंने अपना पहला कदम चला,
वो हाथ अब कंपकपाते है, वो अब बूढ़ी हो रही है।

जिसके चहरे को देख, दुनिया मेरा अनुमान लगाती थी,
मैं उसपे हूँ या हूँ अपने पापा पे,
उस चहरे पर उम्र ,कुछ सिलवटें ले आई है,
वो अब बूढ़ी हो रही है।

जिसने हर एक नए कदम पर मीठा दही खिला कर दी दुआएं,
मेरे अजर अमर रहने की वो ही अब जर हो रही है,
वो अब बूढ़ी हो रही है।

जिसकी दुआओं से मैं आबाद रहा उसे लौटाने को मेरे पास कुछ नहीं है,
ये मेरा जीवन भी उसी की ही तो देन है,
बेटा हूँ न, वो मेरी उम्र भी नहीं लेगी,
माँ है ना, हर वक्त बस दुआएं देगी,
हर रोज़ वो लाल शाम सी ढल रही है, वो अब बूढ़ी हो रही है।

योगेश शर्मा
जयपुर

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