वोट की चोट

वोट की चोट
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पारी पहली वोट की,लगती किसको चोट।
जनता खेले खेल तो,निकले सबकी खोट।।
निकले सबकी खोट,चकनाचूर हों सपने।
पाँच साल का राज,गया हाथों से अपने।
इंतज़ार में बैठ,तुम चर्चा करना सारी।
किसकी होगी जीत,बताएगी यही पारी।

झूठी बातें फैंक के,एक बार हो जीत।
हांडी फिरसे काट की,चढ़े कभी ना मीत।।
चढ़े कभी ना मीत,मिले जैसे को तैसा।
मत है ये अनमोल,खरीद सके ना पैसा।
भेड़-भेड़िया खेल,चला वहीं बुद्धि रूठी।
दशक बीते सात,करते न बातें झूठी।

जीता लालच आज तो,होगी भारी भूल।
उनके होंगे फूल सब,अपनी होगी धूल।।
अपनी होगी धूल,पाँच साल ख़ूब रोना।
सही चुनो सरकार,घोड़े बेंच कर सोना।
समझो अब तो मीत,कितने साल हैं बीते।
झूठे करते राज,तुम हारे कब हो जीते।

सबका समझे मर्ज़ जो,चुनना वो सरकार।
दोनों पार्टी झूठ की,बदलो फिर हर बार।।
बदलो फिर हर बार,अगर बात समझ आए।
बार-बार की जीत,औक़ात है भूलाए।
सुन प्रीतम की बात,जागो शुक्र हो रबका।
वरना लेना देख,क्या होगा हाल सबका।
आर.एस.बी.प्रीतम
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