कविता · Reading time: 1 minute

वैश्या

एक नया रूप
नारी का देखो
कभी थी बेटी 
किसी आँगन की
जो बिक गयी 
दानव के हाथो
एक नया रूप 
मानव का देखो

कोठे में बैठी
किये सिंगार 
बिक रहा जिस्म 
हर रात है देखो

नारी का यह 
अवतार तो देखो
रोता ह्दय 
चहरे पर मुस्कान
यह देखो
एक नया रूप
नारी का देखो (आशु)

1 Like · 56 Views
Like
1 Post · 56 Views
You may also like:
Loading...