May 21, 2017 · कविता
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वे गुज़रे हुए दिन

वे गुजरे हुए दिन
कितने अच्छे लगते है
जो गुजारे दोस्तों के साथ
जो गुजारे परिवार के साथ
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
कोई भी दोस्त—
मिल जाता राहों में
कर लिया करते मन की
बातों ही बातों में—
गुजर जाता पूरा दिन
कितने अच्छे लगते हैं
वे गुजरे हुए दिन !!
मोहल्ला है या परिवार
नहीं था , इनमें कोई भेंद
इस घर उस घर —
खा लिया करते खाना
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
जेब-से रीते- रीते
विश्वास- से भरे – भरे
जेब में होती एक चवन्नी
किसी थड़ी पर,चाय पीते हुए
घंटों बिता लिया करते
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
होली हो या दिवाली
उँगुली पर गिनते दिन
कब आएगें यह दिन
इनके इंतजार में महिनें
गुजार लिया करते थे
कितने अच्छे लगते है
वे गुजर हुए दिन !!
गाँव की सुनसान थायों पर
रात के दूसरे पहर
गुनगुनाते रहते थे
हिन्दी फिल्मों के गाने
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
नहीं थी किसी-से ईर्ष्या
नहीं था किसी-में अहंकार
सुख-दुख के साथी बनकर
रहते थे सब अपना बनकर
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
कितने लम्बे लगते थे
उम्मीद-से भरे हुए दिन
कितने मुश्किल थे, लेकिन
कितने अच्छे लगते है
वे गुजरे हुए दिन !!
————–*————–*————–
लीलाधर मीना

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पता-महेशपुरा (कोटखावदा) जयपुर अध्यापक समसामयिक लेखक शिक्षा - NTT, BA ,BE.d MA (हिन्दी ) बडा... View full profile
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