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वृद्धाश्रम - बुजुर्गों के लिए वरदान या अभिशाप

वृद्धाश्रम – बुजुर्गों के लिए वरदान या अभिशाप
कितना अजीब लगता है कि पुत्र एवं पुत्र वधू अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर उन्हे अपना ख्याल रखने की सलाह दे रहे हैं और यह भी आश्वासन दे रहे हैं कि अगर आपको किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो तो उन्हे जरूर बताऐ। वो उसे तुरंत उनकी सेवा में भेज देंगे। वृद्ध आश्रम में बुजुर्ग माता पिता को ले जाते समय जब पड़ोसी इसका कारण पूछने लगे तो बेटा यह कहकर उन्हे चुप करा देता है कि अब माता पिता उन पर बोझ नहीं बनना चाहते और अपना स्वावलंबी जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। वे कई दिनों से इस जिद पर अड़े हैं कि उन्हे सांसारिक एवं पारिवारिक बंधनों से मुक्ति चाहिए ताकि कुछ समय अकेले रहकर अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त कर सके। यह सुनकर पड़ोसियों को अजीब तो जरूर लगा लेकिन वे भी इस बुजुर्ग दंपत्ति के ऊपर हो रहे अत्याचारों और पड़ोस में हो रही कलह से मुक्ति पाना चाहते थे। आस-पास में रहने वाले सभी लोग जानते थे कि घर पर पुत्र वधू रोजाना ताने मार मार कर इन लोगों को बहुत कष्ट दे रही थी। हर दिन जोर-जोर से यह आवाज सुनने को मिलती थी कि आपके बेटे ने बड़ी मेहनत सें यह फ्लैट खरीदा है। वह अपनी सास और ससुर को यह कहते बिल्कुल संकोच नहीं करती थी कि दिन भर खाली रह कर रोटियां तोड़ने व खाली रहकर समय खराब करने में उन्हें घर चलाना मुश्किल हो गया है। इतना सब सुनकर भी बुजुर्ग माता पिता उस घर को छोड़ने को तैयार नहीं होते। कारण यह नहीं था कि वह अपना जीवन यापन नहीं कर सकते थे या उन्हें पुत्र वधू के ताने अच्छे लगते थे बल्कि कारण तो अपने कलेजे के टुकड़े जैसे पुत्र एवं पुत्रवधू से प्रेम एवं लगाव था जिस पर वह अपनी जान तक न्योछावर करने के लिए तैयार थे।
बुजुर्ग पिता एक समय सरकारी विभाग में चपरासी थे। सेवानिवृत्त होने के बाद थोड़ी सी पेंशन भी मिलती है और माता को भी वृद्धा अवस्था की पेंशन मिलती है। इसी पिता ने अपनी उम्र भर की कमाई अपने इकलौते बेटे की पढ़ाई में यह सोच कर खर्च कर दी कि वह एक दिन बड़ा अधिकारी बनकर उनका नाम रोशन करेगा । उस बुजुर्ग दंपत्ति ने तो अपनी बची हुई सारी धन- दौलत अपनी बेटे की शादी में यह सोच कर भी लगा दी कि कहीं लोग बड़े अधिकारी पर ताने न मारे। वास्तविकता तो यह है कि अगर वे दोनों चाहते तो बड़े ऐशो-आराम का जीवन व्यतीत कर सकते थे और अपने लिए एक अच्छा सा मकान भी खरीद सकते थे। लेकिन उन्होंने तो यह कभी नहीं सोचा था कि ऐसा भी पल आएगा जिसमें अपनी गोद में उठाकर पांच-पांच किलोमीटर तक पैदल चलने वाला व्यक्ति का एक दिन अपने ही बेटे के घर से निकाला जाएगा। उस बुजुर्ग दंपत्ति को वो सभी दिन याद आ गए जब बेटा अपनी मोटी फीस भरने की जिद करने लगा तो माता पिता ने उसकी जिद और अच्छे भविष्य की कामना करने के लिए अपना मकान किसी साहूकार को गिरवी रख दिया था। जिसका कर्ज वह अपनी थोड़ी सी कमाई से कभी चुकता नहीं कर पाए और पुत्र की शादी और फ्लैट में चले जाने के पश्चात वह पुश्तैनी मकान भी उनके हाथ से निकल गया। अब उन लोगों का बेटे के नए फ्लैट में जाना एक मजबूरी हो गया था शादी से पहले बेटे ने अपने बुजुर्ग माता-पिता को यह कहकर भरोसा दिलाया था कि शीघ्र ही वह अपनी कमाई से एक फ्लैट खरीदेगा और उसमें माता-पिता को आरामदायक जीवन देगा। लेकिन उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन अपने ही लोग उन्हें बड़े प्यार से वृद्धाश्रम के सुखद जीवन की कहानी बताकर उन्हें वहां जाने के लिए कहेंगे।
घर में हर समय यही वाक्य दोहराया जाता था कि “इस छोटे से घर से रहना मुश्किल हो गया है कल जब बच्चे बड़े होंगी तो वह कहां रहेंगे ? अच्छा हो अगर माता-पिता किसी वृद्ध आश्रम में जाकर अपना बचा हुआ जीवन यापन करें”। गौर करने की बात तो यह है कि यहाँ पुत्र के कहने की देर थी और उस बुजुर्ग दंपत्ति जिसकी उम्र 65 से 70 साल के बीच की धी, ने तुरंत अपना सामान बांध लिया। वो दोनों तो अपने बच्चों की खुशियों के लिए काला- पानी भी जाने को तैयार हो गए। उनका मानना था कि उनका परिवार खुश रहना चाहिए। फिर चाहे उन्हें राम की तरह 14 वर्ष का वनवास ही क्यों न हो। इस त्याग और बलिदान की भावना के पीछे छिपा था उनका अपनापन प्यार, मोह एवं लगाव। आखिर एक माता जिसने अपने बच्चे को 9 महीने कोख में भी कष्ट नहीं होने दिया वह अब उसे कष्ट कैसे देंगी? कमी थी तो सिर्फ उन संस्कारों की,जो उन्हें उपहार स्वरूप पूर्वजों से मिले थे। वर्तमान में व्यक्ति कितना स्वार्थी एवं स्वावलंबी हो गया है कि वह अपने माता पिता को भी बेसहारा छोड़ देता है।
गत दिवस मेरे मित्र डॉ० विजय कुमार द्विवेदी और श्री प्रवीण मिश्रा द्वारा पटौदी स्थित एक वृद्ध आश्रम में रहने वाले 40 से 50 बुजुर्गों से हुई बातचीत को सुनकर मेरा रोम-रोम कांप उठा। मेरी आंखें आंसुओं से भर आई। जब उन्हें देखकर बुजुर्ग माता-पिता को अपने बच्चों की याद आ गई और उन्होंने एक रुदन स्वर के साथ झूठी सी हंसी दिखाकर उन्हें गले लगा लिया। काश मैं भी उस जीवंत पल में उनकी ख़ुशी को देख पाता। लेकिन मैंने हृदय में छुपी उस खुशी को जरूर महसूस किया,जो एक माता-पिता अपने बिछुड़े हुए कलेजे के टुकड़े से मिलकर महसूस करते हैं। वहां पर रहने वाले कुछ बुजुर्गों ने इसे जीवन की एक नई कला समझकर अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया था। लेकिन उस बूढ़ी औरत का क्या? जो उस आश्रम में 10 वर्ष बीतने के बाद भी यह कह रही थी कि वहां का एकांत और अपनों से बिछड़ने का दर्द उसे अब भी काटने को दौड़ता है। इनमें कुछ ऐसी भी माताएं थी, जो इसे स्वयं का दोष मानकर इसे जीवन का एक अभिशाप मान बैठी थी। उनके चेहरे पर एक झूठी मुस्कान भी नजर नहीं आ रही थी। शायद यह जीवन उनके लिए एक शाप बन गया था। मेरे मन में यह सवाल उठता है कि क्या माता- पिता इसी दिन को देखने के लिए अपने बच्चों को कामयाब बनाते हैं? क्या वह दिन रात का चैन खोकर किसी वृद्ध आश्रम का इंतजार करते हैं? अगर कोई मुझसे पूछे तो मेरा मानना है कि उन्होंने बच्चों को कामयाब करने में अपना खून पसीना लगाया है अब बच्चों को भी वृद्ध माता-पिता की सेवा करके उस ऋण को आसानी से उतारना चाहिए।
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है अगर वो माता पिता के प्रति थोड़ा सा भी प्रेम एवं संस्कार रखते है तो उन्हें अपने माता पिता को सम्मान के साथ घर वापिस लाकर उनकी सेवा करनी चाहिए। ताकि वह जितना जल्दी हो सके अपने बीते हुए दुखों को भूल सके।
क्या विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या बुजुर्गों के प्रति ऐसा रवैया सही है? मेरी भारतीय संसद मे कानून बनाने वाले जन-प्रतिनिधियों से हाथ जोड़कर विनती है कि वो बुजुर्गों के हितों को ध्यान में रखकर ऐसे नियम बनाएं जिससे लोग अपने बड़े बुजुर्गों के अहित का सोच भी न सके । आगामी लेख के माध्यम से मैं समाज के अन्य समसामयिक विषयों पर प्रकाश डालूंगा। आशा है यह हमें नई प्रेरणा देने में सहायक होगा।

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अरविंद भारद्वाज
अरविंद भारद्वाज
Rewari
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शिक्षाविद्, लेखक एवं कवि अरविंद भारद्वाज
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