कविता · Reading time: 1 minute

वृद्धाश्रम की शुरुआत

जब घोर कलयुग पांवए पसारने लगा,
दो पीढ़ियों में अंतर और गहराने लगा।

मोह में फंसा संपत्ति को अपने नाम किया ,
खुद को ही बेटे ने मुखिया घोषित किया ।

बूढ़े माता पिता का दायरा सिमटता गया ,
जवान बहु बेटे का दायरा बढ़ता ही गया ।

माता पिता के खर्चों पर अंकुश लगने लगे,
वो अपनी छोटी जरूरतों को भी तरसने लगे।

दिल तो पहले ही टूट चुका था बेचारों का ,
अब शरीर ने भी साथ देना छोड़ा लचारों का ।

उनकी वक्त बेवक्त की खांसी बुरी लगने लगी ,
उसपर उनकी दवाइयां भी जेब पर भारी लगने लगी ।

अब तो उनकी नसीहतें ,विचार उबाऊ लगने लगे,
उनकी सीधी बातों का उल्टा मतलब निकालने लगे ।

जब माता पिता जायदा ही बोझ लगने लगे ,
बहु बेटा एक कठोर/ निर्मम निर्णय लेने लगे ।

एक रोज उनका समान अपनी गाड़ी में लादा,
सैर करवाने कर बहाने उन्हें गाड़ी में बिठाया ।

दूर कहीं अपनी पनाहों से छोड़ आए आश्रम ,
तभी से बना वृद्ध माता पिता के लिए वृद्धाश्रम।

वृद्धाश्रम भेजने से पूर्व नहीं सोचती निकम्मी संतान ,
कभी वो भी तो बूढ़े होंगे, वृद्धाश्रम छोड़ेगी उनकी सन्तान ।

तभी तो उन्हें अपना किया गुनाह याद आयेगा ,
जब इतहास उनके बेटे के रूप में खुद को दोहराएगा।

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