वीर रस की हास्य कविता

मन करता है गीत सुनाऊं वीरों की परिपाटी के
मन करता है गीत सुनाऊं काश्मीर की घाटी के
कभी-कभी यह भाव सोचकर मैं माइक पर जाता हूं
चीन-पाक को चार चार पंक्ति कहकर निपटाता हूं
शब्द शब्द में मेरे ज्यों अंगार उबलने लगते हैं
फिर दुश्मन पर तोप तमंचे जमकर चलने लगते हैं
जनता में माहौल वीर रस वाला छाने लगता है
हर श्रोता वंदे मातरम् का गाना गाने लगता है
मिले भाव अनुभाव तालियां जम कर पिटने लगती हैं
मातृभूमि पर कई पीढ़ियां उस क्षण मिटने लगती हैं
सब में जोश जगाने कविता आगे बढ़ने लगती है
आठ लाइनें पढ़ते-पढ़ते सांस उखड़ने लगती है

श्रोताओं को मैं रुक कर समझाता हूं
यहां वहां की बातों में उलझाता हूं
बातें करना बिल्कुल नहीं जरूरी है
सांस ना फूले इस कारण मजबूरी है
शब्द शब्द में भारत का भूगोल दिखाई देता है
काश्मीर का हर चप्पा अनमोल दिखाई देता है
निर्दोषों पर रोज जहां पत्थर बरसाए जाते हैं
जो मारें उन पर ना कोई कदम उठाए जाते हैं
चूहों को इस तरह छोड़ना बिल्ली को भी खतरा है
समझो ना समझो ऐसे में दिल्ली को भी खतरा है

पूरे तेवर में गाऊं तो क्रांति तक ला सकता हूं
ज्यादा जोर लगाया तो फिर अस्पताल जा सकता हूं।।
इसीलिए क्यों ज्यादा जोर लगाऊं मैं
बैठे ठाले अस्पताल क्यों जाऊं मैं
भारत तो मजबूत खड़ा हर टक्कर में
मैं क्यों पड़ूं वीर रस वाले चक्कर में
देशभक्ति के छंद लिखे हैं मैंने हर कद काठी के
मन करता है गीत सुनाऊं काश्मीर की घाटी के।

गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश

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