कविता · Reading time: 1 minute

वीर अभिमन्यु

अधर्म का ऐसा नंगा नाच देखो ,
की नन्हे बालक को भी ना छोड़ा।
रचाकर षड्यंत्र चक्रव्यूह का ,
मानवता से कायरों ने मुंह मोड़ा।
पहले तो किया सबने एक साथ प्रहार,
उसके रथ को तोड़ा ।
उठाया उसने भी पहिया रथ का ,
सबके अभिमान को तोड़ा ।
आहत हुआ अभिमान दुराचारियों का ,
रोश उन पर भारी उमड़ा।
कर दिया एक साथ तीर चलाकर ,
आक्रमण नन्हे बालक पर ,
उसका जीवन से नाता तोड़ा।
बहुत लड़ा वो शूरवीर बालक ,
आखरी दम तक साहस न छोड़ा।
उन राक्षसों में कई सज्जन भी थे,
जो दिल ही दिल में रो रहे थे।
उठाया था शस्त्र उस निहत्थे बालक की और ,
मगर अंदर से टूट हुए थे।
करते भी क्या अपने अपने वचनों से ,
बंधे हुए थे ।
ना चाहते हुए भी क्रूर कोरवों के पक्ष से ,
युद्ध करने की बाध्य थे ।
गिरा जब घायल बालक भूमि पर ,
यह सभी तो उनके साथ थे ।
कर रहे थे नन्हे बालक पर वार पर वार ,
दुष्ट कौरव सेना के साथ ,
मगर भीतर से व्याकुल थे ।
आखिर दम तक बालक लड़ा ,
और वीर गति को प्राप्त हुआ ।
अपने माता पिता और गुरुजनों का ,
सर गर्व से ऊंचा कर गया था।
उसकी इस अल्पायु की शौर्य गाथा ने ,
विधाता को भी झिंझोड़ा।
हुए अंत में धर्म की जीत,
और अधर्मियों का नाश हुआ।
परंतु पांडवों वंश के इस वीर अभिमन्यु का ,
जग में नाम अमर हुआ ।

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