वीणा मैं तुम्हारी जिसके तुम तार

वीणा मैं तुम्हारी जिसके तुम तार
साज हूँ मैं तुम्हारा तुम उसका सार
सुर भी संगीत भी मधुर अहसास जब हो तकरार
सुगम हो जाती राह बनती जब इकतार

निर्झरिणी मैं तुम्हारी जिसकी तुम धार
विषम राह प्रस्तर जो पार कर चली हर बार
नील गगन की दामिनी जो उज्ज्वलता भरी
संग जिसके वारिद शीतलता भरा

स्वप्न को उर में सजाये नभ का खग हूँ
विश्वासो की डोर जिसके संग है
आशाओं का सिन्धु बन नव मोड़ लाया हूँ
वेदना विषमताओं को भी झकझोर पाया हूँ

वीणा में तुम्हारी जिसके तुम तार

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