कविता · Reading time: 1 minute

विलीन

हो जाता है “विलीन”
धरा के कोख़ में एक बीज….
विशाल दरख़्त में
परिवर्तन पाने के लिए
धरा के साथ विद्रोह एवं क्रान्ति कर…
धरा के सीने को चीर कर
फूटता है बीज अंकुर बनकर…
“परिवर्तन” के लिए…..
सिर्फ “परिवर्तन” के लिए….

कर चुका हूँ मैं भी “विलीन”
अपने आप को….
अपनी स्वतंत्र सोच को
पवित्र शब्द
पुनर्जन्म के कर्मों को…
आस्था के विस्तार
आधार को
और अपने अस्तित्व को…..
परिवर्तन के लिए…..
सिर्फ परिवर्तन के लिए….
परिवर्तन निश्चित होगा
मुझे विश्वास है…..
उसे होना ही होगा….

सुनील पुष्करणा

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