Apr 13, 2018 · कविता
Reading time: 1 minute

विलासिता

कमरे में बंद विलासिता
बाहर के अंधकार के
दर्द से बेखबर
रात भर अठखेलियाॅ करती रही।
भीतर की मिश्रित
खिलखिलाती
मधुर ध्वनि
बाहर के अंधकार का
मखौल उडाती रही।
रजनी स्वयं के अंधकार में
रोते बिलखते स्वर सुन
भौर तक काॅपती रही।
और अंदर भौर होकर भी
रात ही मचलती रही।

23 Views
Copy link to share
डा० गजैसिहं कर्दम साहित्यकार अध्यक्ष भारतीय दलित साहित्य अकादमी मेरठ Books: अंतर्मन काव्य संग्रह Awards:... View full profile
You may also like: