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विरह गीत

विधा -तंत्री छंद

विधान-प्रति चरण 32 मात्रायें ।
8/8/6/10 मात्राओं पर यति। दो- दो चरण समतुकांत होते हैं।
चरणांत दो गुरु (2 2) से होता है ।

पिया लौट कर, अब आ जाओ,तुम बिन घर, आँगन सूना है|
हृदय विकल हो, रोता हरपल, मन का यह, कानन सूना है|

नस-नस में तुम, दौड़ रहे हो, अंतस की, आकुलता तुम हो|
ऐसी अनबुझ, प्यास जगी है, मधुर मिलन, व्याकुलता तुम हो|
आकर शीतल, पावन कर दो,नित मूर्छित ,आनन सूना है|
पिया लौट कर, अब आ जाओ, तुम बिन घर, आँगन सूना है|

दिवस बीतता, तुम्हें सोच कर, रात स्वप्न, में तुम आते हो|
नींद खड़ी मुख, देख रही है, आँखों में, यूँ बस जाते हो|
जले रात दिन, दीपक जैसे, बाट तके, नयनन सूना है|
पिया लौट कर, अब आ जाओ, तुम बिन घर, आँगन सूना है|

पिया मिलन की, आतुर बाँहे, पुष्प खिले, कब संगम होगा |
प्राणों से हो, प्राण मिलन तब,अधरों पर, सुख सरगम होगा|
सूख गए हैं, कुसुमित धरती, भ्रमर बिना, उपवन सूना है|
पिया लौट कर,अब आ जाओ,तुम बिन घर,आँगन सूना है|

तिल-तिल करके, रोज जलाती, विरह व्यथा, मुश्किल सहना है|
तुम बिन जीवन, हवन हुआ है, तुमसे बस इतना कहना है|
धरा जेठ की, ज्यों बारिश बिन, तुम बिन यह, जीवन सूना है|
पिया लौट कर, अब आ जाओ, तुम बिन घर, आँगन सूना है|

-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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