विरह गीत

_वीर_छंद आधारित विरह गीत

लिखा हुआ है क्यों किस्मत में,इतना लंबा विरह-वियोग।
लगा गये हो जाते-जाते, बड़ा-भयानक दिल का रोग।

सुबक रही हूँ अबोध शिशु-सी,
मन को समझाएगा कौन।
नित शब्दों का ताना- बाना,
बुनती रहती हूँ मैं मौन।
तड़प रही हूँ नित्य अकेले,
लिये हुए प्राणों में पीर।
रोम-रोम मुर्छित ज्वाला से,
तुम बिन कैसे पाऊँ धीर।
हुईं विरह में हालत ऐसी,पगली कहते मुझको लोग।
लिखा हुआ है क्यों किस्मत में,इतना लंबा विरह-वियोग।

सूने सब श्रृंगार हुए हैं,
बिखरे बिंदी,चूड़ी, केश।
नूर गया रौनक भी खो दी,
जब से पिया गये परदेश।
विरह व्यथा पीड़ित विषाद मुख,
आकुल अंतस करे पुकार।
शीतल नहीं हमें कर पाता,
मलय-समीर-सरस-संचार।
तुम बिन जग की रौनक फीके,नहीं सुहाते छप्पन भोग।
लिखा हुआ है क्यों किस्मत में,इतना लंबा विरह-वियोग।

चंचल मन चातक सी नयना,
बेकल रहता है दिन-रैन।
जब-जब सुध जगती है तेरी,
तब आती है मुझको चैन।
सूरज बैरी बना हुआ है,
बेकल करता हुआ समीर।
पर्वत जैसी विरह वेदना,
रोम-रोम देती है चीर।
न मरने न जीने देता है,जब से लगा विरह का जोग।
लिखा हुआ है क्यों किस्मत में,इतना लंबा विरह-वियोग।

मेघ झरे सावन बैरी है,
नित्य अमावस की संत्रास।
पल-पल पिया-पिया करती हूँ,
मन में लिए मिलन की आस।
ढ़ूंढ़ रही नित तड़प-तड़प कर,
सुनी सेज होकर बेहाल।
विरह-वेदना सहते-सहते,
बीत गये हैं कितने साल।
मधुर मिलन से तृप्त हृदय हो,कब होगा ऐसा संयोग।
लिखा हुआ है क्यों किस्मत में,इतना लंबा विरह-वियोग।
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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