विरह गीत

विरह गीत
********
श्यामघटा घनघोर निहारत
बूँद झमाझम गीत सुनाए,
दादुर शोर हिया झुलसावत
खेत हरी चुनरी लहराए।

प्रीत लगी जब साजन से तब
नैनन नींद नहीं कछु भाए,
चातक के सम राह तकूँ नित
आवत रात मुझे तरसाए।

मोर पिया परदेस गए सखि
झूलन गीत रहा तड़पाए,
निष्ठुर भाव धरै उर में लखि
पावस की ऋतु आग लगाए।

जाग कटे रतिया सगरी बिन
साजन चैन जिया नहि पाए,
आन मिलो सजना हमसे
रजनी अब सेज सजा अकुलाए।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
ंपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी(उ.प्र.)

1 Like · 198 Views
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका।...
You may also like: