.
Skip to content

विरहणी

Ankita Kulshreshtha

Ankita Kulshreshtha

गज़ल/गीतिका

May 19, 2016

अक्षर अक्षर नाम तुम्हारे करती हूँ..
जब मैं इस जीवन के पन्ने भरती हूँ..
~~~~~~~~~~~~~~~
कलियां हों या हों कंटक इन राहों में…
बाधाओं से कब किंचित मैं डरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~~
बीत रहे हैं पल बहती सरिता जल से…
इक पल जीती हूँ दूजे पल मरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~~
छा जाते मेघा काले विस्तृत नभ पर..
बूंदों संग बनकर आंसू तब झरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~
सुनती हूं कागा को बुनती हूँ सपने…
ओढ़ विरह को सजती और सँवरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~
अक्षर अक्षर नाम तुम्हारे करती हूँ..
जब मैं इस जीवन के पन्ने भरती हूँ..

अंकिता

Author
Ankita Kulshreshtha
शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा- कहानी लघुकथा गज़ल गीत गीतिका कविता मुक्तक छंद (दोहा, सोरठ, कुण्डलिया इत्यादि ) हाइकु सदोका वर्ण पिरामिड इत्यादि|
Recommended Posts
मैं बेटी हूँ
???? मैं बेटी हूँ..... मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ..... मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस... Read more
जो चाहता हूँ वो भूल नही पाता हूँ लौट कर मैं वही आ जाता हूँ
जो चाहता हूँ वो भूल नही पाता हूँ लौट कर मैं वही आ जाता हूँ बेवफ़ा की बेवफाई का सितम मैं ही पाता हूँ चुपके... Read more
मैं चंचल हूँ मेघों के पार से आया करता हूँ ।
मैं चंचल हूँ, मेघों के पार से आया करता हूँ मैं चंचल हूँ , मेघों के पार से आया करता हूँ । मै अग्नि हूँ... Read more
लड़कियों के प्यार से डरता हूँ मैं
लड़कियों के प्यार से डरता हूँ मैं ! आज की तलवार से डरता हूँ मैं !! चाहता हूँ बोल दूँ उसको खुदा , किन्तु इस... Read more