मुक्तक · Reading time: 1 minute

विमौहा छंद

छंद- विमोहा
मापनी- 212 212 (गालगा गालगा)

आप जो मिल गये
फूल हैं खिल गये
मन सुवासित हुआ
दीप से जल गये

*धर्मेन्द्र अरोड़ा*

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