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विद्यासागर चालीसा

हमारी कृति विद्याधर से विद्यासागर चोपाई शतक से संक्षिप्त मे देखिए चालीसा के रूप मे सादर…

दोहा
वंदन

तीन तोक तिहुँ काल मे,
पंच.परम पद ध्यान।
श्रीजिन धरम जिनागम,
श्रीजिन चैत्य महान।

जिन दर्शन पूजन महां,
चैत्यालय सुखकार।
नवदेवों की वंदना,
भाव सहित चित धार।

तीर्थंकर महिमा सुनो,
तीन लोक हर्षाय।
इन्द्र बने अनुचर सभी,
चरणन शीश झुकांय।।

तीस चौवीसी यादकर,
अति निर्मल परिणाम।
विद्यमान जिन पूज रच,
तब निश्चित शिवधाम।।

तीन लोक जिन बिंव की,
करुँ वंदना आज।
‘अनेकांत’निज चित्त मे,
श्रीजिन बिंव विराज।।

विद्याधर से विद्यासागर

चालीसा
छंद-चौपाई

आर्य भूमि भारत कहलाती।
महिमा मंडित सुख उपजाती।।

तीर्थकर जिन जन्म जहाँ पर।
काज सफल सब होंय वहाँ पर।।

मंगलमय नित कारज होते।
बीज पुण्य का सज्जन बोते।।

भारत माँ के लाल सभी तब।
आर्य कहाते यहा तभी सब।।


कर्नाटक इक राज जहाँ पर।
चारों तरफ स्वराज वहाँ पर।।

बेलगाँव शुभ जिला विराजा।
श्रावक श्रेष्ठि करें शुभ काजा।

कर्नाटक का पुण्य अपारा।
मुनियों ने जो उसे सँभारा।
दोहा
ऐसी पावन भूमि से,
कुंद कुंद भगवंत।
ज्ञानसागर कृपा से,
विद्यासागर संत।।


दो हजार तीन संवतसर।
शरद पूर्णिमा तिथी शुभंकर।।

सदलगा स्वर्ग नगरी लगती।
गुरु जन्म हुआ सुंदर सजती।।
१०
पिता मलप्पा घर मंगलमय।
श्रीमती माँ की जय जय जय।।
११
विद्याधर शुभ नाम रखाया।
मात पिता का मन हरषाया।।
१२
महावीर अग्रज थे जिनके।
शांति अनंत अनुज जग चमके।।
१३
सुवर्णा शांता बहिन कहाईं।
पूज्य आर्यिका पदवी पाई।।
१४
पिता मलप्पा मुनि पद धरते।
महावृति बन शिव पथ चलते।।
१५
श्रीमती माँ आर्यिका बनती।
सारी दुनिया जय जय कहती।।
१६
यौवन पथ पर चिंतन चलता।
विद्याधर वैराग उमड़ता।।
१७
जयपुर की तब राह पकड़ली।
सच्चे गुरु की जहाँ शरण ली।।
१८
देशभूषण गुरु यहाँ विराजे।
विद्याधर के कारज साजे।।
१९
गुरु चरणों मे शीश झुकाया।
बोलो फिर क्या रहे बकाया।
२०
विद्याधर जिस पथ पर चलते।
आठ कर्म बस वहीं से नशते
दोहा
विद्याधर उपवास के,
तीन दिवस गए बीत।
ब्रह्मचर्य व्रत के लिए,
गुरु चरणों मे विनीत।।
२१
विद्याधर के भाव समझकर।
ब्रह्मचर्य व्रत देते गुरुवर।।
२२
गुरुवर तो थे आतमज्ञानी।
शिष्य की समझे अंतर वाणी
२३
आदेश शिष्य को तब यह दीना।
आत्मज्ञान मे बनो प्रवीणा।।
२४
ज्ञान सिन्धु अजमेर विराजे।
वहीं तुम्हारे कारज साजे।।
२५
पहुँच गए अजमेर नगरिया।
गुरु चरण ही मोक्ष डगरिया।।
२६
विद्याधर हो दृढ़ संकल्पित।
गुरु चरणों मे भाव समर्पित।।
दोहा
सुन संकल्प प्रसन्न गुरु,
मंद मंद मुस्कांय।
विद्याधर शिव पथिक को,
संयम पाठ पढ़ांय।।

२७
उच्च पठन पाठन नित करते।
गुर चरण रज माथे धरते।।
२८
मुनि दीक्षा के हेतु निवेदन।
गुरु चरणों मे करके वंदन।।
२९
विद्याधर गुरु भक्ति करते
गुरु कृपा तब उनपर करते।।
३०
सर्व प्रथम जिन मंदिर जाते।
सिद्ध भक्ति कर शीश नवाते।
३१
श्रेष्ठ कार्य जब करना होता।
सिद्ध नाम ही जपना होता।।
दोहा

दीक्षा विधि पूरी हुई
विद्याधर वस्त्र उतार।
जलद मेघ झरने लगे,
अतिशय हुआ अपार।।

संत शिरोमणि बन गए,
विद्यासागर संत।
जय जय जय सब बोलते,
ज्ञान सिन्धु भगवंत
३२
वैरागी पथ सब परिवारा।
सब मिल बोलो जय जय कारा।।
३३
आचार्य श्रेष्ठ पद के धारी।
संघ चतुर्विध के अधिकारी।
३४
त्याग तपस्या कठिन साधना।
मुनि चर्या निर्दोष पालना।।

३५
वृतियों की बस होड़ लगी है।
लम्बी भक्त कतार लगी है।।
३६
गणितसार विज्ञान पढ़े जो।
जिन आगम विद्वान.बने जो।।
३७
मुनि आर्यिका पद धरते हैं।
संघ.सुशोभित जो करते हैं।।
३८
ऐसे संघ विशाल बना जब।
मूल संघ पहचान बना तब।।
विद्यासागर गुरु उपकारी।
तीन लोक मे मंगलकारी।।
३९
विद्यासागर महामुनीश्वर।
महाकाव्य लिख श्रेष्ठ कवीश्वर।।
४०
गुरुवर सच्चे ज्ञानी ध्यानी।
आज लोक मे कोई न शानी।।
अंत भावना
संत शिरोमणि विद्यासागर।
मुनि मारग के श्रेष्ठ उजागर।।
‘अनेकांत’कवि अंत भावना।
गुरु चरणों मे संत साधना।।

राजेन्द्र जैन’अनेकांत’
बालाघाट दि.३-०६-१८

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