कविता · Reading time: 1 minute

विडंबना

कैसी विडंबना है ,
पहले विद्यालय बंद हुए ,
जिसके फलस्वरूप बच्चे
Online पढ़ने लग गए ।
बच्चों के मानसिक और शारीरिक ,
स्वास्थ्य का पहले ही बहुत नुकसान हो रहा है ,
और अब तीसरी लहर से ,
बचाने हेतु बच्चों के विद्यालयों को
ही अस्पताल बना दिया गया ।
करे भी क्या!
जीवन बचाएं या भविष्य ,
यह ज्वलंत प्रश्न बन गया।
इस करोना ने बड़ों का ही नहीं,
बच्चों का भी जीवन तबाह कर दिया ।
देश का भविष्य अधर में तो होगा ही ,
जिंदा रहना जो सबसे जरूरी हो गया।
जिंदा रहे तो भविष्य की सोचेंगे,
अन्यथा!!
भविष्य तो गया गर्त में।
जीवन बचाना जहां युद्ध बन गया हो ,
वहां भविष्य की कौन सोचे!
बच्चों के अरमान और उनके सपने,
माता पिता की अभी अभिलाषाएं,
और बच्चों से आशाएं ।
सब पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है ,
अस्थाई तौर पर ।
सब के मन में एक ही प्रश्न ,
“जाने कब जायेगा हमारे जीवन से करोना ।

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