विजेता

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उसे देखते ही शमशेर ने उससे प्यार से कहा,”चल गोलू लाडो।”
शमशेर ने अपनी भाभी के तीखे अंदाज को अनसुना कर दिया था।अपने चाचा के मुँह से प्यार के शब्द सुनकर गोलू की भी हिम्मत बंधी।उसने अपनी माँ से कहा,”माँ! गुस्सा ना करै। चाचा-चाची ब्होत अच्छे सैं।चाची तेरै खात्तर एक साड़ी ल्याई सै, बाबा खात्तर धोती-कुरता और मेरी खात्तर मालपड़े—–।”
अपनी बच्ची को बीच में ही टोकते हुए भाभी जी बोली,”गोलू की बच्ची!चुप हो ज्या।” फिर उसने शमशेर को संबोधित करते हुए कहा,”आड़े तैं लिकड़ज्या,ना तै इसा आलम(इल्जाम) लगा दूँगी के किते मुँह दिखावण जोग्गा भी नहीं रहवैगा।”
अपनी भाभी की यह बात सुनकर शमशेर सहम गया।उसे अपनी भाभी से इस प्रकार के गैर जिम्मेदाराना बर्ताव की अपेक्षा नहीं थी। पिछले कुछ दिनों से गोलू उनके घर पर आने लगी थी। इससे शमशेर तथा बाला को यह लगने लगा था कि बड़े भाई-भाभी को अब उनसे शिकायत नहीं है।उन्हे लगा कि अलग होने के कारण पैदा हुई कटुता अब मिट जाएगी और इसीलिए वे पति-पत्नी मकर-सक्रांति के पावन पर्व पर अपने से बड़ों का हर गिला दूर कर देना चाहते थे परन्तु शमशेर को यहाँ आकर इस सच्चाई का पता चला कि गोलू तो उनके घर अपने माता-पिता से छुपकर आती थी।
शमशेर ने बड़ी नरमी के साथ अपनी भाभी से कहा,”भाभी! तूं बड्डी-स्याणी होकै इसी घटिया बात करती शोभा ना देती। मैं थाहरे तैं छोटा सूं,न्यू बेशर्मी दिखाके नीच्चे नै मत गिरै भाभी।”
अपने देवर की यह बात सुनकर भाभी जी ने तैश में आकर कहना शुरू किया,”नीच तो लिकड़्या तूं। नौकरी लागते के साथ आँख बदलग्या तूं। तेरे माँ-बाप तन्नै छोटे- से नै छोड़कै चल बसे थे पर तन्नै अपणे उस भाई का साथ छोड़ दिया जिसनै तूं काबिल बणाया।” इस दौरान भाभी जी ने यह बात छुपा ली कि वह अपने इस देवर के कपड़े तक नहीं धोती थी। इस बीच गली में कुछ औरतें झुंड बनाकर उन देवर- भाभी की लड़ाई का आनंद लेने लगी थी।
शमशेर ने धीमे स्वर में कहा,”भाभी! तन्नै भी तो बाला गेल्यां कोए कसर नहीं छोड्डी। वो बिचारी भूखी-प्यासी मेरे भाई गेल्यां खेत म्ह लगी रहती। तूं मेरे भाई की रोटी दे आती पर वा घर आकै खुद बणाकै खाती। खैर छोड़ उन बातों नै। गोलू नै भेज दे।खा लेगी दो टूक।”
“अच्छा! मन्नै के थाहरे टूकों के भरोसे जाम राक्खी सै छोरी। म्हारे घर ना आइये आगे तैं, थाहरा-म्हारा नाता टूट लिया सै।”
“पर इसम्ह इस बिचारी बालक नै क्यूं उलझावै सै तूं? इसनै मालपूड़े इतणे पसंद सैं के तड़के खात्तर बचाण की भी कहवै थी।इस कन्या नै जो हम भरपेट नहीं खिला सके तो त्यौहार मनावण का फायदा के भाभी?”

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