कविता · Reading time: 1 minute

विजेता

माफी चाहती हूँ। अति व्यस्तता के चलते कई दिनों बाद पोस्ट कर रही हूँ। अब विजेता को आगे पढें।
“देख बेटा,मैंने पाँच छोरियाँ भी ब्याही थीं पर इतना खर्च तो ना हुआ।”
“तो कौन-सी सुखी है उनमें से?पिछले महीने ही तो तेरी बड़ी बेटी अपनी सास के हाथों पिटकर आई थी तेरे पास। मैं ही सुलझा आया उस मसले को वरना वे लोग तो उसे रखने को तैयार नै थे।”
मुखिया जी की यह बात बुढ़िया को प्रभावित कर गई।उसकी पाँचों बेटियाँ गरीबी की चक्की में पिस रही थी। वह नहीं चाहती थी कि उसकी लाडली राजो भी उसी चक्की में पिसे।
प्रत्यक्ष रूप मे उसने मुखिया से कहा,”बेटा,मैं ये सोचा करती थी कि सास-ननद तो जरूर हों पर मेरी पाँचों छोरियो को सास-ननद ही नहीं बसने दे रही। मैं राजो की खातिर सास-ननद नहीं चाहती।”
“तो फिर इस रिश्ते को ठुकराना मूर्खता होगी ताई।”
“पर मैं ग्यारह सौ लाऊँगी कहाँ से?”
यह सुन मुखिया ने रहस्यमयी आवाज में कहा,”ताई,एक रास्ता है। किसी से कहना मत।”
“नहीं कहूँगी बेटा। बता रास्ता क्या है?”

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