गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

विजात छंद

विजात छंद
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मापनी – १२२२ १२२२
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सुहानी शाम है आई,
गगन पर लालिमा छाई।
सुधाकर है दिखा अब तो ,
सुहानी रात है आई। 1
कली मिटने लगी देखो,
सुमन बन गंध फैलाई। 2
दिखी कोयल अभी जब तो ,
प्रिये तुम याद है आई। 3
प्रिये तुम हो हमारा धन ,
जगत सौगात है पाई।4
यहाँ पाकर तुम्हें अब तो ,
नहीं है लालसा कोई। 5
__________राहुल प्रताप सिंह

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