कविता · Reading time: 1 minute

विजय रथ उसको मिलेगा

विजय रथ उसको मिलेगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा
विजय ध्वज उसको मिलेगा
विजय रथ उसको मिलेगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

राष्ट्र्पथ पर जो चलेगा
जीत केवल उसकी ही होगी
युद्ध पथ पर जो बढ़ेगा
विजय रथ उसको मिलेगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

जयमाल उसको मिलेगी
संघर्षपथ अग्रसर जो होगा
जयघोष उसकी ही होगी
जो विजयपताका थाम लेगा
विजय रथ उसको मिलेगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

जयघोषणा उसकी होगी
जयपूर्ण कर्म जो करेगा
विजय स्तंभ उसका बनेगा
गौरवपूर्ण जिसका भूतकाल होगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

ज़र्रा – ज़र्रा कायल उसका होगा
सारी कायनात पर अहसान जिसका होगा
स्मारक उसका बनेगा
संघर्ष जिसकी पहचान होगी

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

जीवनी उसकी लिखेगी
जीवन जिसने जिया होगा
आदर्श जिसकी पूँजी होगी
संकल्प जिसने लिया होगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

जय मंगल गान उसका होगा
जिसने सबका मंगल किया होगा
जयघोष उसकी ही होगी
जो दूसरों के लिए जिया होगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

जय परायण केवल वो होगा
जिस पर प्रभु का हाथ होगा
जगमगायेगा वही इस धरा पर
जिसने पत्थर को तराशा होगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

पायेगा वही जाकर वहाँ कुछ
जिसने यहाँ कुछ खोया होगा

विजय रथ उसको मिलेगा
धर्म पथ जो चलेगा

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