विजय भैया

विजय भैया उर्फ बिज्जू भैया, बचपन में हमारे घर पर रहे। मेरी ताईजी उनकी बुआ लगती थी। मामाजी ने जमशेदपुर से हमारे यहां पढ़ने भेजा था।

ये भी मजेदार बात थी कि मामाजी के बच्चे स्कूल की शिक्षा लेने यहाँ आते थे और हमारे कई भाई कॉलेज की पढ़ाई के लिए जमशेदपुर में मामाजी के घर पर रह कर पढ़ाई करने जाते थे क्योंकि तब तक हमारे गांव में कॉलेज नहीं बना था।

ये एक तरह की विद्धार्थी विनिमय योजना थी। इसके मूल में जो भावना रही होगी कि बच्चे गाँव में पढ़ेंगे तो बिगड़ेंगे नहीं और एक बार मैट्रिक परीक्षा पास करली तो कॉलेज में जाकर बिगड़ने का मौका कम है, तब तक समझदारी भी आ जाती थी।

उस समय मैट्रिक परीक्षा पास करना बहुत बड़ी बात होती थी। इसको पास करने का गर्व भी गलत कामों में जाने से रोकता।

पर बिज्जू भैया का दिल पढ़ाई में नहीं लगा। ये शहर की हवा का असर था या और कोई कारण था ये तो नहीं मालूम। दोस्त भी मिले तो पढ़ाई से जी चुराने वाले।

कुछ शिक्षक भी ओझा पंडित जी जैसे मिले, जो ये विश्वास रखते थे कि बच्चे मार खाकर ही पढ़ाई करेंगे। बच्चा मार खाने के खौफ से अपना दिमाग पढ़ाई को दे नहीं पाता, वो इसी डर में रहता है कि पता नहीं कब मौके बेमौके मास्टरजी के हत्थे चढ़ जाए।

एक बार शिक्षक ने ये राय बना ली कि ये बच्चा पढ़ने वालों में से नहीं है फिर वो पिटने वालों की जमात में आ जाता है।

इसी डर से स्कूल से अनुपस्थित रहने की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा, कुछ और सहपाठी भी थे जो इसके समर्थक थे। बस फिर क्या था स्कूल का नाम लेकर घर से निकल कर किसी के बगीचे या खेतों या सुनसान जगहों पर सप्ताह के एक दो दिन गुज़रने लगे ताकि सिर्फ पाँच दिन ही मार पड़े।

इन दो दिनों के अज्ञातवास मे समय बिताने के लिए किसी के बगीचे से फल चुराए गए और बाकी के खाली समय में गाँव का राष्ट्रीय खेल ताश काम आयी। जो धीरे धीरे जुए में तब्दील होती गयी।

दिमाग की तेजी इस खेल में जब नज़र आई तो दिल को एक सांत्वना मिली कि भगवान ने मूर्ख तो नहीं बनाया है। पत्ते समझ में आते है , जिंदगी भी समझ में आ ही जाएगी।

रही बात पढ़ाई लिखाई की तो उसमें ओझा पंडित जी की अनावश्यक पिटाई कटघरे में दिखाई देने लगी।

किसी तरह पाँच छह जमात तो पास हो गए, उसके बाद पढ़ाई से तौबा कर ली।

तब तक ये ख्याति प्राप्त कर चुके थे कि ताश खेलने में इनका कोई जवाब नहीं।
पिछली दो तीन बाजियों में किसने क्या पत्ता डाला था , दिमाग में एक दम साफ अंकित रहने लगा था।

पर ये शौक कहीं न कही एक हद में ही रहा, संस्कार और घर की शिक्षा कहीं पीछे खड़े थे।

कुछ पक्की दोस्तियां भी इसी खेल के दौरान मिली। जो आज तक कायम है।

घरवाले भी जब समझ बैठे कि अब इनसे पढ़ाई नहीं होगी तो वापस अपने घर भेज दिया।

मध्यमवर्गीय परिवारों की नियति होती है कि पढ़ाई लिखाई हुई
तो ठीक है नहीं तो काम धंधे में लग जाओ।

आदमी की विशेषता ,जो अब तक समझ में आयी है कि जब तक वो अपने आप को राजी नहीं कर लेता, तब तक दूसरे की बात समझ में जरा कम आती है

इसी क्रम में, कुछ दिनों बाद जब ये अहसास होने लगा कि अब कुछ करना होगा,
फिर जिंदगी ने भी करवट लेनी शुरू कर दी।

अपनी बुआ के बेटे , हमारे भाईसाहब जो सनदी लेखाकार की डिग्री लेकर किसी कंपनी में अच्छे पद पर थे और जिन्होंने जमशेदपुर में उनके घर पर ही रह कर कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी, के पास कोलकाता चले आये।

भाईसाहब ने प्रयास करके मॉडर्न ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी लगा दी। जिंदगी धीरे धीरे ढ़र्रे पर लौटने लगी। रहने का ठिकाना भी गिरीश पार्क के पास जयपुरिया मंदिर में हो गया, जो नानाजी के परिचित के संरक्षण में था।

अब जिंदगी नियमित होने लगी थी, सप्ताहांत में मध्यमग्राम में भाईसाहब के यहाँ जाकर पूरे सप्ताह की प्रगति की जानकारी देना, उनके सामने अंग्रेजी समाचार स्टेट्समैन जोर जोर से पढ़ना, क्योंकि दफ्तर में काम चलाऊ अंग्रेजी तो आनी जरूरी थी।

मंदिर में रहकर जीमने का न्यौता देने आने वालों के लिए , पंडितों की सूची तैयार करके उन्हें निर्दिष्ट जगहों पर भेजना।

विशेष अवसरों जैसे कि श्राध्द के महीने में जब पंडितों की मांग बढ़ जाती , उसकी आपूर्ति के लिए बिहार से आये प्रवासी ब्राह्मण ट्राम और बस चालकों से भी जान पहचान कर उन्हें भी यजमानों के यहाँ भेजने लगे।

इससे ये फायदा हुआ कि कोलकाता के अधिकांश ट्राम और बस चालकों ने अपनी कृतज्ञता के तहत इनसे किराया लेना बंद कर दिया। अब कोलकाता में जहां चाहे मुफ्त जा सकते थे।

एक दिन इसी आपूर्ति लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमारे ही गाँव के एक मजदूर को धोती कुर्ता पहना कर यजमान के यहाँ जब भेजा, तो दुर्भाग्यवश यजमान की बहू हमारे गाँव की ही बेटी निकली, जिसने उसे पहचान लिया और खरी खोटी सुनाकर वापस भेज दिया।
पेशे के तहत लिये गए जोखिम की सीमा समझ आ गयी थी।

खैर ये सब तो चलता रहा, इस बीच छुट्टियों में जब भी घर जाते तो पहले गाँव जाकर एक दो दिन रहते , पुरानी ताश मंडली बैठती। अब घरवाले भी लायक हो गए भतीजे को कुछ नहीं बोलते। उसके बाद औपचारिकता की खतिर ही जमशेदपुर जाना होता।

गाँव के सारे प्रसिद्ध जुआरी इनको अब जानने लगे थे और जो व्यक्तिगत रूप से परिचित न भी हो तो नाम तो सुन चुके थे।

अपने भविष्य के प्रति सचेत होने पर, व्यक्ति लगातार बेहतर अवसर तलाशता है, बिज्जू भैया ने अब मुम्बई जाने की तैयारी कर ली। वहाँ की एक कंपनी पर्ल प्लास्टिक में नियुक्ति ले ली।

सलीके से रहने की आदत शुरू से थी, शर्ट पतलून हो या कुर्ता पायजामा, हर समय धोबी का इस्त्री किया हुआ होता, मजाल है कि कपड़े में कोई सिलवट दिख जाए।

धीरे धीरे कंपनी के मालिक के विश्वासपात्र होते चले गए। अपने तेज दिमाग, व्यवहारिकता, चीजों को गौर से परखने की कला ने शिक्षा की कमी को पूरा कर दिया।

एक दिन, एक व्यापारी के पास बहुत दिनों से कुछ रुपये अटके पड़े थे, तो मालिक ने इस मसले को सुलझाने को कहा।

उस कंपनी के दफ्तर पहुंचने पर, जब प्रबंधक के कक्ष में जा रहे थे, तख्ती पर नाम पढ़ते ही,

दरवाज़ा पे हल्की सी थपकी देकर, May I come in Sir

उधर से Yes की आवाज़ आते ही,

दरवाज़ा खोलकर अंदर पहुंचकर, Mr. Jacob, I am Vijay Kumar Sharma from Pearl Plastic Company.

प्रारंभिक प्रभाव पड़ चुका था, अब मि.जैकब को भी हिंदी में बात करने में कोई परेशानी नहीं हुई।

बकाया रुपये का चेक साथ ही लेकर आये।

एक बार गाँव आये , तो सीधे ताश के अड्डे पर चले गए, उसी दिन शाम को जमशेदपुर लौटना था, इसलिए खाकसार को समझा कर गए , दो तीन घंटे बाद बुलाने आ जाना, क्योंकि जुआरी दोस्त उठने नहीं देंगे ।

जब मैं वहां पहुँचा, तो दोस्तो ने घर का बुलावा आया देख , उन्हें जाने दिया, तब तक अच्छी खासी रकम जीत चुके थे, साथ लौटते वक्त मेरे हाथ में पांच रुपये के दो नोट रख दिये, जो उस वक़्त हम बच्चों के लिए बड़ी रकम होती थी।

मैं मन ही मन खुश होकर सोच रहा था कि ऐसा मौका दोबारा कब मिलेगा।

बहरहाल , उनका गाँव आना जाना इसी तरह चलता रहा, एक बार किसी काम से मैं उनके दोस्त की दुकान पर गया, दो तीन लोग और भी बैठे हुए थे, किसी ने पूछा किसके घर का बच्चा है, एक ने मेरे भाई का नाम लिया, दूसरा बोल उठा, इसको ऐसे नहीं समझ आएगा,

रुको मैं समझाता हूँ, टाटा वाले बिज्जू को जानते हो।

पूछने वाले जुआरी ने हाँ मे सिर हिलाया,

बस उसी के घर का है।

मैं अपने इस परिचय से आश्चर्यचकित था।

खास लोगों को समझाने के लिए खास लोगों को ही उतारना पड़ता है!!

अब पूछने वाले कि सारी जिज्ञासा शांत हो गयी थी। वो बोल पड़ा, यार अभी है कहाँ?

मुम्बई में बहुत दिन रहने के बाद, वो जमशेदपुर लौट आये।

अपने छोटे भाई को मुम्बई वाली कंपनी में तब तक नियुक्त करवा चुके थे।

लगभग १५ साल पहले जब एक ट्रांसपोर्ट कंपनी की एक शाखा में उनकी प्रबंधक के पद पर जब नियुक्ति होने वाली थी, तो निदेशक ने पूछा कि शिक्षा की डिग्री वगैरह है क्या?

बिज्जू भैया ने शांत स्वरों मे जवाब दिया, देखिए डिग्री और सर्टिफिकेट के नाम पर तो खुद आपके सामने हूँ। हाँ, कार्यं अनुभव से संबंधित आप जो चाहे पूछ सकते है।

आजतक उसी कंपनी मे अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं।

साल में एक दो बार उनसे कोलकाता में मुलाकात हो ही जाती है। उनके आने से भाइयों के साथ ताश का कार्यक्रम अनिवार्य है।

कोई नौसिखिया, मैरिज के खेल में तीन सीक्वेंस दिखाकर , ताश की गड्डी के नीचे दबे हुए जोकर एक बार देखने के बाद, दोबारा देखता हुआ दिखाई देने पर,

फिर उनका तकियाकलाम ही सुनता है-

“यार तुम पढ़े लिखे बैल हो, एक बार देख लिया तो दोबारा देखने की जरूरत क्या है फिर?”

जिंदगी के इस संघर्ष में शिक्षा जरूरी तो है पर कुछ लोग अपनी जहनी तेजी और अनुभव के खजाने से ही, किसी भी परिस्थिति में खुद को तुरंत ढाल लेते है। बहाव कितना भी हो ठीक तैर कर निकल जाते है।

कोरोना महामारी के समय भी कभी कभी उनकी ऑनलाइन ताश खेलने की प्रक्रिया जारी है भाइयों के साथ!!

जहाँ चाह वहाँ राह

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