Oct 25, 2020 · कविता
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“विजयादशमी”

“रावण” रूपी “दम्भ” दहन हो,
“मर्यादा” का “राम” अमर हो।
अलख धर्म की, जगे जगत मेँ,
मन विवेक की, ज्वाल प्रबल हो।

विजय सत्य की, रहे हमेशा,
झूठों का प्रतिकार, प्रबल हो।
शीश बुराई का, कट जाए,
अच्छाई की धार, सबल हो।

मिट जाए अज्ञान, धरा से,
बुद्धि, सुमित अरु ज्ञान प्रखर हो,
विद्या बल को, आत्मसात कर,
सुख,समृद्धि,सन्मार्ग, दरस हो।

घृणा, द्वेष का हो, मुख-मर्दन,
प्रेम सुधा, रसधार प्रबल हो।
भवसागर से हम, तर जाएँ,
कितनी भी मझधार, सकल हो।

महिमा सदा, त्याग की अप्रतिम,
लिप्सा का हर भाँति, क्षरण हो।
कायरता के सम्मुख, लेकिन
सदा वीरता का ही, वरण हो।

कटु वचनों से, मिले प्रतिष्ठा,
लेशमात्र भी, यह न वहम हो।
रीति परस्पर, वह अपनाएँ,
स्नेहिल, सद्व्यवहार, सरस हो।

सब को प्रतिदिन, मँगलमय हो,
जीवन का प्रतिपल ही, शुभ हो।
नव “आशा”, उल्लास हृदय हो,
“नवमी”, “विजयादशमी”, शुभ हो..!

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रचयिता-

Dr.asha kumar rastogi
M.D.(Medicine),DTCD
Ex.Senior Consultant Physician,district hospital, Moradabad.
Presently working as Consultant Physician and Cardiologist,sri Dwarika hospital,near sbi Muhamdi,dist Lakhimpur kheri U.P. 262804 M.9415559964

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