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विजयश्री

Rajesh Kumar Kaurav

Rajesh Kumar Kaurav

कविता

March 12, 2017

विजयश्री के जश्न में,
बजते ढ़लोक और मृदंग ।
नृत्य गान रंग गुलाल से ,
बदल गये सबके रंगढंग।
मिला श्रेय जो सौभाग्य है,
करने को प्रभु के काज ।
वरन् बक्त बदलते ही,
लुटती रहती है लाज ।
जो जितने ऊपर होता है,
उसको मिलती उतनी खाई।
सतह न त्यागे यदि कभी,
दुनिया करती रहेगी भलाई।
माना हो शिखर के कलश,
सत्ता,शक्ति सब कुछ पास में।
बुरे बक्त न पड़ता कोई काम,
कर्म ही रह जाता है हाथ में।
रच गये जो इतिहास नया,
श्रेष्ट कार्य कर समाज का ।
उन्हें वरण किया विजय ने,
साथ दिया है जीवन का।
जो उपेक्षित करे कर्तव्यों को,
विजयश्री के आँचल मेंं।
उन्हें न करता माफ जगत,
औकात दिखाते आपस में।
समय चक्र अब पलटा है,
कुछ करके दिखलाना होगा।
वरन जो हश्र आज उनका है,
वही कल तुम्हरा भी होगा।

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