Jul 26, 2020 · कविता
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विचलित

आस्था और विश्वास की
उम्मीदों से
आ पहुँचा हूं
तेरी सरहदों मे ।

आवाज दे के बुला ले
या लौटा दे मुझे
नतमस्तक खड़ा हूं
तेरे इन्तजार मे ।

बरसेगी कृपा तेरी
रहमतो की
टकटकी लगायें हूं
तेरे द्वार मे ।

विचलित हुआ है मन
अपराध बोध से
क्षमा प्रार्थी हूं
तेरे चरणो मे ।।

राज विग 26.07.2020.

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Raj Vig
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