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वाॅक डाऊन

‌‌लाकडाऊन ”

लगता था अब तक,
ब्यस्तत्ता ही जीवन है,
खाना हो न हो,
दौड़ते रहना,
शरीर और दिमाग से,
हर वक्त।
मशीन वन गया था,
भूल गया था,
आत्मा भी रहती है,
इसी शरीर में।
शायद थक गया था।
रिले दौड़ में
बैटन अगले हाथ में देना
ही लक्ष्य रह गया था
जीवन का।
आज लगा
सूरज तो वैसे ही उगता है,
पक्षी भी रहते हैं,
मेरे आसपास,
चहचहाते भी है।
मन्दिर में घंटियाँ,
भी बजती हैं।
पर न मन दौड़ रहा है,
न शरीर ही।
नाश्ते में क्या वना है,
पता है।
घर में और कौन कौन हैं,
पता है।
घर में प्राणियों के इलावा,
कोई “और”भी है,
इसका आज एहसास हुआ।
यह सब संभव हुआ,
“क रो ना” से
लाकडाऊन ने सिखाया ,
कुछ मत कर,
खुद को जान,
अन्तर मन को टटोल
ढूंँढ “उस “को,
जो हर पल तेरे साथ है।
शायद स्वयं को टटोलना ही
जीवन है।
सब कुछ खोकर
अंतर्मन में झांकना ही
सव कुछ पाना है।
यही जीवन है।
यही जीवन है।

डा.कुशल कटोच.

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