Dec 12, 2020 · कविता
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वासना

अनंत अतीत अकाल चली आ रही,
चलती रहे जब तक पृथा पली जा रही,
कामशूत्र में कामदेव की कामना है वासना।

अनंत भुवन में अम्बर में, धरातल पे,
भूलोक से इंद्रलोक तक हो जिसका पालना,
काम लहर में कामिनी की कामना है वासना।

जीते दिल-ए-पत्थर को, ऋषि महऋषि विश्वामित्र हो
पत्थर हो मेनका चाहे, चाहे जिसे वो जलाना,
इंद्र की हूर नारी की, कामना है वासना।

राजा से चली, रंक में पली, जवानी मे खिली,
दहकती कशक है ओडे सावन का छालना,
फंसे भंवर मे, भँवरे की कली से कामना है वासना।

राज जीते, राज हारे, राज बन कर राज में चली,
राज मारे, राज से जिसके लिए पङा तलवारें तानना,
लाज में छुपी लज्जावती की कामना है वासना।

देवेन्द्र दहिया- अंबर

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Devender Kumar Dahiya
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