वाद- प्रतिवाद

मार्ग जो करें भीड़ तय
चलना उसपे ग़वारा नहीं
खुद की सोच और विचारधारा
इतनी अशक्त और कमजोर नहीं

सोचता हूँ कभी कभी
वाद प्रतिवाद से क्या फ़ायदा
वो जो कह रहा है
उसे भी कुछ सुन लूँ
बात तो बढ़नी ही है तो
बात को आगे बढ़ाने का
यह भी है एक रास्ता

जिसके दिमाग मे भरा हो द्वेष विषाद
खुद को रोक नहीं पाता
भले ओढे हो शराफत का लबादा
जब तक मन मे भरा जहर
न निकाल ले
फुफकारता रहता है
सड़ांध निकालता रहता है

झूठ का साम्राज्य खड़ा करने हेतु
अपने कपोल कल्पित अपरिपक्व
कुतर्कों के महल खड़ा करता है

जब सत्य की तर्क की
पवित्र हल्की सी भी झोंका बहती
ये कुतर्कों का बना महल
ताश की पत्तो जैसा ढह जाता है

अक्सर मुझे आपको सभी को
एक नसीहत मिलती रहती है
उतावलेपन में
आग में
कूद पड़ना
कहीं से वाज़िब नहीं

सामने उदंड धूर्तो की भीड़ हो
तो कोई अकेला
और निहत्था
क्या लड़ेगा
भले ही वह
सत्य की लड़ाई हो

समय देखकर
चुप हो जाना
हार का संकेत नहीं
सब्र भी युद्ध का
हिस्सा है नीति है
यह भी एक रास्ता है

आदमी के भीतर का
स्वाभिमान जब
जंग के लिए
ललकारता है तो
उसे कोई और
अस्त्र-शस्त्र की जरूरत नही

जो शब्दो के वार को ही ना झेल सकें
उनपे कर पत्थर के प्रहार
समय का जाया क्यों करें

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