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वाकया

अतुल कुमार राय

अतुल कुमार राय

कविता

December 5, 2016

खुले केश अधरों पर लाली/शोभित बिंदी माथे पर,

बंजर जमीं पर मुद्दतों बाद/बारिश आयी हो जैसे!

पीली साड़ी श्वेत बदन का/कर रहे बखूबी थे श्रृंगार,

नाक पे गुस्सा तीखी नजर/कयामत लायी हो जैसे!

चूड़ी लाल हिना के संग/हाथों का मचलना अच्छा लगा,

पाँव में पायल और घुँघरू/प्यार की धुन बजायी हो जैसे!

उसके कंधे पर हाथ रखा/जब ‘अजनबी’ दिल सहम गया,

स्टेशन पर वो लगा विदा/पिया को करने आयी हो जैसे!

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Author
अतुल कुमार राय
"तू हँसी अधर रुख़सार का तिल,मैं थके नयन का लोर प्रिये।" ग्राम+पोस्ट-मुर्तजीपुर जिला-गाजीपुर(उ.प्र.) संपर्क सूत्र-मो.नं.-९४५२०७५००७

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