कविता · Reading time: 1 minute

वही आवाज़

SUPRABHAT
मित्रों आज फिर से उसने आवाज लगाईं
जो मुझे सुनाई
मीरा सूर काली औ कबीरा
सूफी सांत औ गाये फकीरा
तू मेरा है मैं हूँ तेरा
रहता कहाँ धर्म जाती का फेरा
तेरा मेरा रिश्ता पूरा
बाकी सारा जगत अधूरा
सत्य हूँ मैं और प्यार भी मेरा
मैं भी होना चाहूँ तेरा
बाल्मीकि की संस्कृत अनोखी
गाए मस्त होकर रविदासा
तेरा मेरी भूल के प्राणी
ध्यान लगा क्यों मिला शरीरा
कोई नहीं तेरा सबकुछ मेरा
क्षणभंगुर ये जीवन तेरा
सत्य को जान मुझे पहचान ले
बस इतना ही समय अधीरा
न मंदिर में न गिरजा में
न मस्जिद में गुरुद्वारे में
मैं तो तेरे अन्दर बैठा
मैं बाहर भी कण-कण व्यापा
क्यों भटका तू मुझे विसराय
मैंने ही तो खेल रचाया
मुर्ख जन ने मुझको बांटा
कई भेदों में मुझको गाया
फिर भी इन्सान समझ न पाया
झूठा ही पाखंड रचाया
कर्मों के कारन दुःख पाया
और मुझे दोषी ठहराया
तू मेरी प्यारी एक रचना
कैसे तुझको मैं बिसरा दू
सारे दोष है तेरे भुलाकर
मैंने सदा ही गले लगाया
आज कहूँ फिर-फिर ये तुमसे
खुद को जानो और पहचानो
क्यों मैंने तुम्हें इनसान बनाया
रहो प्रसन्न मिलजुलकर सारे
मैंने तो वसुधैवकुटुंब बनाया
करो वही जो खुद को चाहो
व्यर्थ किसी को नहीं सताओ
आज यही सन्देश दिलाया

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