कृतिकार पं बृजेश कुमार नायक की कृति /खंड काव्य क्रौंच सु ऋषि आलोक की समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
कृति का नाम -“क्रौंच सुऋषि आलोक
समीक्षक-डा मोहन तिवारी ” आनंद “

प्रसिद्ध गीतकार बृजेश कुमार नायक का उत्कृष्ट खंडकाव्य “क्रौंच सुऋषि आलोक” समीक्षा के पटल पर है |खंड काव्य काव्य की एक बिधा है| भारत में कविता इतिहास और दर्शन बहुत पुराना है| इस का प्रारंभ भरतमुनि से माना जाता है| काव्य के बारे में कहा जाता है कि काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोयोग से पूर्ण हो |काव्य वह कला है जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है| रसगंगा धर में रमणी अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहा गया है|
साहित्य दर्पण दर्पणाकार विश्वनाथ के अनुसार रसात्मक बात ही काव्य है| उनके अनुसार रस अर्थात मनुष्य मनोवेगों का सुंदर संचार ही काव्य की आत्मा है |”कौंच सुऋषि आलोक” को रचनाकार ने खंड काव्य की श्रेणी में उल्लेखित किया है |साहित्य के वर्ग विभाजन में खंड काव्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि इस में उल्लेखित पात्र की संपूर्ण इतिवृत्त( जीवन कथा) का वर्णन न होकर किसी एक अंश का वर्णन किया ज़ाता है | खंड काव्य सात से कम सर्ग हो तथा विषय वस्तु केे जिस भाग का वर्णन किया जा रहा हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण हो, प्रकृति दृश्य आदि का चित्रण देश काल के अनुसार और संक्षिप्त हो ,प्रयुक्त छंद विधान में एकरूपता हो|

“कौंच सुऋषि आलोक” का मैने सांगोपांग अध्ययन किया और पाया कि श्री बृजेश कुमार नायक जी ने इस कृति में जो बिंदु उठाए हैं, वे अद्वितीय हैं, खंड काव्य के अध्ययन से ऐसी गंभीर जानकारियों से अवगत होने का अवसर मिला जो अभी तक मेरे ज्ञान से बहुत दूर थीं और सामान्य पाठकों को भी दुर्लभ इस शेधपरक ग्रंथ के लेखन में श्री नायक के कुशाग्र मानस का कौशल स्पष्ट परिलक्षित हुआ है |उनका अध्ययन मनन और चिंतन यह दर्शाता है कि वह एक लगनशील चिंतक और गंभीर लेखन के धनी हैं|

इस खंडकाव्य “कौंच सुऋषि आलोक” के सृजन मैं कवि ने कुंडलिया छंद का प्रयोग किया है |कृति के संबंध में कुछ विचार व्यक्त करने के पूर्व मैं चाहता हूं कि इस में प्रयुक्त छंद- विधान पर भी कुछ प्रकाश डाला जाए|
कुंडलिया मात्रिक छंद परिवार का विषम मात्रिक छंद है| यह छंद दो छंदों के युग्म से बनता है |प्रयुक्त प्रथम छंद दोहा तथा दूसरा छंद रोला होता है |अतः प्रथम दो चरण दोहा (24 -24 मात्राएं) एवं चार चरण (24-24 मात्राएं )के होते हैं |दोहे का अंतिम चरण रोला के प्रथम चरण में जोड़ दिया जाता है और दोहा के प्रथम चरण का प्रथम शब्द रोला के अंतिम चरण का अंतिम शब्द होता है हो जाता है इस तरह एक सर्पाकार कुंडली बन जाती है इसमें 24-24 मात्राओं के 6 चरण होते हैं|
अब यहाँ यह भी आवश्यक है कि इन दोनों छंदों के विधान पर भी थोड़ा-थोड़ा प्रकाश डाला जाए अतः प्रथम छंद
दोहा -यह अर्धसम चार चरणों वाला मात्रिक छंद है| इस के विषम चरण, प्रथम एवं तृतीय चरणों में 13-13 मात्राएं तथा सम चरण द्वितीय और चतुर्थ में 11-11 मात्राएं रहती है |इस छंद में तुक सम चरणों (द्वितीय और चतुर्थ) के अंत में होती है तथा युति हर चरण के अंत मे| दोहा में यदि विषम चरण के आदि में जगण का प्रयोग किया जाता है तो दोहा दोषपूर्ण माना जाता है| इसी प्रकार सम चरणों के अंत में लघु आना अनिवार्य माना जाता है |
उदाहरण
वंदे मातरम् में छिपा भारत माँ का प्यार|
जाति धर्म का भेद तज, यह सबको स्वीकार ||
रोला -रोला चार चरणों वाला सम मात्रिक छंद है |जिसके प्रत्येक चरण में 11-13पर यति देकर 24 मात्राएं होती है| प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ चरण के अंत में तुक रहती है |प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु रहते हैं|
उदाहरण
हे देवो, यह नियम, श्रष्टि में सदा अटल है|
रह सकता है वही ,सुरक्षित जिस में बल है ||
निर्बल का है नहीं, जगत में कहीं ठिकाना
रक्षा साधन उसे प्राप्त, होता हे ना ना||
खंडकाव्य “क्रौंच सुऋषि आलोक” की भूमिका में डा अन्नपूर्णा भदोरिया,पूर्व विभागाध्यक्ष जीवा जी विश्व विद्यालय ग्वालियर ने उल्लेखित किया है कि ऋषि क्रोंच ईश्वरी सत्ता को आत्मसात करने वाले श्रेष्ठ तपस्वी थे |उनकी इसी तपस्या पूर्ण जीवन की सुंदर प्रस्तुति, कवि ने खंड काव्य के रूप में की है |इस कृति में मध्यकालीन काव्य परंपरा को प्रमुखता दी गई है |जैसे प्रारंभ प्रार्थना, वंदना, आरती ,समर्थन एवं स्वयं का परिचय इत्यादि| जैसा कि साहित्य के वर्ग -विभाजन में खंड का को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि” इसमें उल्लेखित पात्र की संपूर्ण इतिवृत्त (जीवन कथा) का वर्णन न होकर किसी एक अंश का वर्णन किया जाता है |खंडकाव्य में सात से कम सर्ग हो तथा विषय वस्तु के जिस भाग का वर्णन किया जा रहा हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण हो प्रकृति दृश्य आदि का चित्रण देश काल के अनुसार और संक्षिप्त हो|प्रयुक्त छंद-विधान में एकरूपता हो |”
के अनुसार यह खंड काव्य साहित्य कसौटी पर खरा उतरता है |इस खंड काव्य के प्रधान नायक ऋषिवर क्रौंच के तप एवं तप से प्राप्त उपलब्धियों कोशब्द संयोजन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है | खंडकाव्य में प्रयुक्त छंद सरल है,सुबोध हैं | शब्द विन्यास उत्कृष्ट श्रेणी का है तथा काव्य के सार तत्वों से भरा पूरा, छंद विधान की कसौटी पर जाँचा-परखा हुआ है |विषय वस्तु में विभिन्न चित्रों की विविधता का समावेश काव्य को बहुआयामी और आकर्षक बना रहा है |खंडकाव्य में सर्ग -विधान होने की शर्त को इस कृति में पर्यावरण ,होली राधा-कृष्ण के भाव-उद्गार, श्रीराम का चेतना लोक, एवं कोंच नगर का विकास आदि विषयों को वर्गों में विभक्त किया जाकर पूर्ण किया गया है|
इस कृति “क्रौंच सुऋषि आलोक ” के नायक यशस्वी ऋषि क्रौंच ईस्वी सन् के पूर्व जन्म लेने वाले महान तपस्वी हैं, जिनके तप से उनकी आत्मा का ईश्वरीय सत्ता से साक्षात्कार हुआ और आकाशवाणी हुई कि ‘हे ऋषिवर मैं आपकी भक्ति से प्रसन्न हूँ |आपको आशीर्वाद देता हूँ कि आपके नाम की सत्ता का आलोक अमर कीर्ति के रूप में निरंतर प्रकाशित होता रहेगा | हे ऋषि श्रेष्ठ !आपके नाम क्रौंच से इस तपस्थली पर एक नगर का विस्तार होगा,जो आपके दिव्य ज्ञानरूपी कृतित्व के स्पर्श के कारण आमजन को आह्लादित करेगा ,आपके यश चहुँ ओर विकास होगा|

जंगल गुफा प्रदेश में, करते ऋषिवर ध्यान|
गगनलोक वाणी तभी बोली सुनो सुजान ||
बोली सुनो सुजान, देव-सम पोषक प्राणी|
सघन भक्ति-सम्मान कर रही ईश्वर वाणी ||
‘नायक’दिव्य सु वाक्य हुआअब दूर अमंगल |
सुनो ध्यान-ऋषि क्रौंच साक्षी सारा जंगल||

नगर आप के नाम से ,बसे सुनो यह बात |
सेवा का फल मिलेगा, दिव्य सुऋषि सुन आज||
दिव्य सुऋषि सुन अाज , प्रेम-सद्ज्ञान लुटाओ |
अमर सुयश को धार भजन ईश्वर के गाओ||
‘नायक’बोला गगन ,कौंच आनंदित सुनकर|
शिष्यों से कह रहे , बसेगा यहाँ शुभ नगर||
इस कृति का शुभारम्भ प्रार्थना

चरम चेतना दर दे, सद्ज्ञान वृद्धि का बर दे
अमल भारती समता-ममता भारत में भर दे

से हुआ है ,जो महाप्राण सूर्यकांत निराला जी की
वर दे वीणावादिनी वर दे के समरूप आभाषित है |इस प्रार्थना के बाद समर्पण के रूप में गणेश वंदना.
गणपति यह संसार हो, ज्ञान-प्रेम सुखधाम |
जन मन में हो सजगता, शत-शत बार प्रणाम ||
शत-शत बार प्रणाम मुस्कुरा उठे धरणि-जन |
दावानलमय वृत्ति ,उढे प्रभु छूमंतर बन |
‘नायक’अमल विवेक ,अभय तज,मतकर निज क्षति||
सजग ज्ञान-आलोक ,सहज बुधि सतपथ गणपति

इस कृति का हर सर्ग अपने उद्देश्य को सफलता के अंजाम तक ले जाने में सफल हुआ है जिनमें आश्रम का विकास
गुरुवर ने देखे कई आश्रम-पर्वतराज|
मगर ध्यान हित एक गिरि खोज लिया है आज ||
इसी तरह पर्यावरण ,सर्ग में
पौधे ईश्वररूप हैं, नर जीवनआधार |
वडा वृक्ष दो गुना सुन, यही ज्ञान-पुचकार||
इसी प्रकार लाठी, होली,राधा-कृष्ण प्रेम, श्री राम का चेतनालोक, कोंच नगर का विकास सर्ग अपने आप में अद्वितीय है |
मैं श्री बृजेश कुमार नायक जी ,विद्वान कवि को नमन करते हुए इस उत्कृष्ट कृति के सृजन की बधाई देने के साथ अनुरोध करना चाहता हूँ कि खंड काव्य सृजन की शर्तों के अनुरूप यदि छंद-विधान में एकरूपता का ध्यान रखा गया (कहीं-कहीं प्रयुक्त छंद में साहित्यिक विधान की कमियां और अन्य छंद (गीत- कविता) का प्रयोग होता तो शायद अधिक उत्तम रहता शुभकामनाओं सहित
कृति. – “क्रौंच सुऋषि आलोक” (खंड काव्य)
कृतिकार -बृजेश कुमार नायक
संपर्क -सुभाषनगर, केदारनाथ दूरवार स्कूल के.
पास ,कोंच,जिला-जालौन ,285205
उत्तर प्रदेश
मोबइल 99 5692 8367
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म प्र तुलसी साहित्य अकादमी भोपाल की मासिक पत्रिका “कर्मनिष्ठा”, मई 2017,अंक-157 से साभार
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-क्रौंच सु ऋषि-आलोक’ कृति(खंड काव्य) का द्वितीय संस्करण,नए कवर एवं नए ISBN के साथ वर्ष 2018में “साहित्य पीडिया पब्लिसिंग” से प्रकाशित है| जो भारतवर्ष में अमेजोन, फ्लिपकार्ट एवं साहित्यपीडिया स्टोर पर उपलब्ध है |

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