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वर्तमान और कलियुग में संबंध ही नहीं !!

Dr. Mahender Singh

Dr. Mahender Singh

कविता

December 6, 2017

हमने तो सोचा था !
हर राज़ खुलेगा !
खुलेगी पट्टी हर एक बंद आँख से !
बंद होगी चक्रव्यूह की रचना !
चीरहरण का हर राज खुलेगा !
सीताहरण के राज पहचानेंगे !
अब कुछ ना छुपा रहेगा !
बस सच को जानेंगे !
.
पर मालूम न था !
साहित्यकार
बहाने बाज निकलेंगे !
क्या कहना है !
पहले ही सीखा गये हैं !
क्या होने वाला है !
पहले ही आधार रख गये !!
.
कलियुग है !
कलियुग है साहेब !
कलियुग !
घोर कलियुग !
.
किसने सिखाया है !
कौन कह रहा है !
विज्ञान है ! वरदान है !
आपके हित में है !
सुख-सुविधाएं बढ़ी है !
उपयोग करो !
जरूरत को समझें !
.
क्यों व्यर्थ कलियुग कलियुग
चिल्लाते हो !
युग की पुष्टि वर्तमान है
अतीत या भविष्य नहीं !!
.
जिसे जिससे जुड़ना है जुड़े !
खुला आकाश है !
मामला खुद से जुड़ा है !!
चाहे कलियुग माने !
चाहे सतयुगी समझे !!

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Author
Dr. Mahender Singh
(आयुर्वेदाचार्य) शौक कविता, व्यंग्य, शेर, हास्य, आलोचक लेख लिखना,अध्यात्म की ओर !

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