Jun 14, 2021
मुक्तक · Reading time: 1 minute

व्यंग्य

बारिश के मौसम में जैसे मेढ़क करते टर्र-टर्र।
वैसे ही कुछ कवियों को लगता वो हो गए चर-फर।।
रचनाओं में ना कोई रस ना भावनाओं का समंदर।
पढ़ लिया तो जैसे लगता खा लिया चुकुंदर।।
स्वरचित एवं मौलिक।
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लेखन में उत्कृष्टता लाने का प्रयास करें।
ना की कुछ भी लिख कर लोगों का समय बर्बाद करें।

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