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आतंकवादियों की देश के अंदर से सहायता वाले आस्तीन के सापों के लिए एक रचना

saurabh surendra

saurabh surendra

गज़ल/गीतिका

July 13, 2017

देखकर हमारी शहादत जिसको खुशी मिलती है
है अपना मगर शक्ल पड़ोसी से उसकी मिलती है

ऐसा भी नही की मालूम न हो ठिकाना उसका
पर सियासत के दिल में वोटों की बेबसी मिलती है

अजब रिवायत है इस शहर की ,वफाओं को भूख
और धोखों को बिरयानी से भरी कटोरी मिलती है

वतन से मुहब्बत ही हमें खामोश नहीं रहने देती
वरना चुप रहने की हिदायत तो हमें भी मिलती है

वतनपरस्ती का तो ये आलम है यहाँ पर सौरभ
जुबां पे तो मिलती है ,पर रगों में नहीं मिलती है

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