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वजूद

Varsha Jain

Varsha Jain

कविता

September 24, 2017

एक ही पटरी पर दौड़ती जिंदगी
रोजमर्रा की जद्दोजहद से गुजरती जिंदगी
खो सा गया है अस्तित्तव कहीं
औरत हूँ बस यह याद है…..
स्वतंत्र वजूद कहीं खो सा गया है मेरा
जिन्दा हूँ खाने के लिए या खा रही हूँ जीने के लिए
न जाने कितने किरदारों में जी रही हूँ मैं
औरत हूँ बस यह याद है…..
स्वतंत्र वजूद कहीं खो सा गया है मेरा
अब तो न सुहानी लगती सर्दी
न गुदगुदाती है बारिश
हर दिन एक सा
हर मौसम एक सा
एक ही पटरी पर दौड़ती जिंदगी रोजमर्रा की जद्दोजहद से गुजरती जिंदगी…..

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Varsha Jain
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