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वक्त किसी का नहीं आता

सारी उमर गई बीत,
मैं कुछ नहीं कर पाया।
मैं रीता घट-
भर नहीं पाया।
बीता सारा जीवन,
कल कल करते।
किंचित साहस नहीं किया,
रहा व्यर्थ ही डरते।
अब चला चली की बेला है,
मेरा अंत समय आया।
सभी कर्म जवानी के हैं,
धर्म भी अधर्म भी।
नहीं बुढ़ापे में कर पाते,
ढंग से नित्य कर्म भी।
नहीं साथ दे पाती बुद्धि,
संग नहीं देती काया।
जब करने लायक थे,
कुछ नहीं किया।
रहे रखाते देह,
प्रति क्षण आराम किया।
हरदम रोता रहा,
मेरा वक्त नहीं आया।
वक्त किसी का नहीं आता,
वक्त को लाया जाता है।
कठिन परिश्रम से समय,
अनुकूल बनाया जाता है।
मेरे नाकारापन ने मुझको,
यह दिन दिखलाया।

जयन्ती प्रसाद शर्मा

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