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लो हो गयी खत्म हड़ताल

मैं
लो हो गई खत्म हड़ताल
क्या मानी कुछ सरकार.?
या यों ही बे – कार गया
ये बे समझी का विचार.. ||

हड़ताली
घणी सब्जी खिलारी और
दूध गलियाँ मयं उड़ेला रे
मारे काइं फर्क पड़नो हो
म्हारे कने कोणी धेला रे ..||

(मतलब इस हड़ताली के पास जमीन व पशु सम्पत्ति नहीं थी)

मैं
(फिर)क्यों लोगों का मन दुखाया
तूने दूध गलियों में बहाया |
गरीबों पर तरस ना आया.
क्यों किसान नाम डुबाया..?।।

हड़ताली
मस्ती सागे पिसा मिल्या
अखबारां में फोटो आया रे |
वे पिसा वोट तोड्न गा था
मेंह् किसान ने ढाल बनाया रे ||

मैं
क्यों पानी हुआ दूध माँ का ?
तूने जमीर मार गिराया है |
क्या मकसद जग में आने का
बता तूने कितना निभाया है ?||

हड़ताली
जमीर जगाया मेरे अंदर गा
तेरा बोल तीर सा लाग्या रे |
मैं सोयो पड्यो 45 सालां गो
कदी गाव म्हारे विराज्या जे |

मैं ( फिर मैंने भी दो शब्द उनकी भाषा मे ही सुना दिए)
मैं छोटो सो लेखक रे भायां
बस सोच बदलने री सोची है…|
के ले ल्यो गा बेमानी करगे
जद खानी दो वक्त री रोटी है ||

हड़ताली
बेटा एक्लो कोणी रियो तूं
अब मैं भी तेरे सागे हूँ ..|
सो बन्दा जागे गा अब
बस एक मिनख रे जागे सूं||

*लेखक : सुखचैन मेहरा* सम्पर्क सूत्र 9460914014
रायसिंह नगर जिला श्री गंगानगर, राजस्थान
335051

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Sukhchain Mehra
Sukhchain Mehra
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मैं कोई लेखक या कवि नहीं हूँ.. अपने भावों को लिखकर प्रकट करने का शोंक...