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लोग

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

August 20, 2016

बंद किवाड़ो की
दरारों से झाँकते लोग
दीवारों से कान लगाकर
कुछ सुनते -सुनाते लोग
लगाकर उसमें नमक -मिरच
किस्से घडते -घडाते लोग
शब्दों केअभेद्य बांण चलाकर
दिलों को तार-तार कर जाते लोग
न सोचें न समझें
सुनी -सुनाई पर
एक दम, राय बनाते लोग
कभी हँसते साथ
तो कभी वो ही
रुलाते लोग
सामने कुछ,
पीछे कुछ और
यही दोगलापन
दिखाते हैं लोग
अपना समय
बस इसी तरह
बिताते हैं लोग
वाह रे लोग….
वाह रे लोग …..।

Author
Shubha Mehta
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