लॉक डाउन ( तालाबंदी )

ऐसे लॉक डाउन ( तालाबंदी ) के अवसर किसी की पूरी जिंदगी में शायद ही कभी कभार आते हैं , जब ये हमें ज़िन्दगी की आपाधापी से दूर आत्मााावलोकन एवम आत्म चिंतन हेतु एक स्वर्णिम सुअवसर प्रदान करते हैं ।इतने लंबे लॉक डाउन की समय अवधि को देखते हुए मैंने पहले ही दिन यह तय किया की समय काटने के लिए मैं कुछ लिखूंगा अतः अपनी आत्म संतुष्टि के लिए मैंने यह लेखन आरंभ कर दिया और अब खुद ही त्रस्त हूं कि जिस दिन कुछ उद्गार लिख नहीं लेता दिन अधूरा लगता है ।
आज ऐसी कुछ जीवन में परिवर्तन कर देने वाली जिस घटना का विवरण मैं करना चाह रहा हूं वह कुछ दशक पुरानी है जब मेरे अधीन एक वृद्ध और एक वृद्धा आईसीसीयू में आमने-सामने के केबिन में ह्रदय आघात से पीड़ित हो भर्ती थे । उस वृद्धा की सेवा में उसकी एक घरेलू सौम्य सी जवान पोती हर समय जुटी रहती थी । उसे उठाना बैठाना खिलाना पिलाना इत्यादि की देखभाल करती थी ।
उसी के सामने वाले केबिन में भर्ती वृद्ध की सेवा में उसका सामान्य सा गबरू जवान पोता 24 घंटे अपने दादा की सेवा में लगा रहता था । उसी प्रकार उठाना बैठाना – खिलाना पिलाना और देखभाल करना। यह दोनों लड़का लड़की अपने बाबा दादी की बीमारी की वजह से लगभग वर्तमान की लॉक डाउन जैसी व्यवस्था में iccu की उन केबीन्स में रह रहे थे । मैं जब कभी राउंड पर जाता तो उनकी सेवा टहल में वही मिलते थे ।इस तरह से उनको करीब एक हफ्ता हो गया । धीरे-धीरे उन मरीजों की हालत में सुधार होने पर मैंने उनके रिश्तेदारों से उनसे छुट्टी करा कर घर ले जाने के लिए कहा तो वह लोग अलग अलग से मेरे पास आए और कहने लगे –
डॉक्टर साहब अभी हम लोग दो-तीन दिन इनकी अस्पताल से छुट्टी नहीं कराना चाहते हैं ।कारण यह है कि वो जो दोनों लड़का लड़की आप देख रहे हैं और जो अपने दादा दादी की सेवा में हर वख्त दिन रात जुटे हैं , इस बीच आपस में कुछ एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं और इनके बाबा दादी लोगों ने इनका आपस में रिश्ता कराने का निर्णय लिया है । इनके रिश्ते के लिये हम दोनों परिवारों के बीच आपस में बात चल रही है , अगर आप दो-तीन दिन इनको अस्पताल में रहने की मोहलत और दे दें तो शायद यह रिश्ता पक्का हो जाएगा । किसी को हॉस्पिटलाइज्ड रखने का यह इंडिकेशन मैंने किसी भी किताब में नहीं पढ़ा था । पर मैंने उस समय उनकी अस्पताल से छुट्टी नही की थी ।
आज इस लॉक डाउन के माहौल को देखते हुए मुझे यह बीती घटना याद आ गई । आज भी इस तालाबन्दी में न जाने कितनी छतों पर , कोटों – परकोटों , गली मोहल्लों और चौबारे में कितनी ही ऐसी घटनाएं हो रही होंगी जो की तमाम लोगों के जीवन मे नए-नए रिशतों और सम्भावनाओं को आनेवाले समय में जन्म देंगी ।और कुछ नहीं तो कम से कम मानव अथवा समाज के लोगों को इस एकांतवास में चिंतन और आत्मविश्लेषण कर अपने को और श्रेष्ठ बनाने का शुभ अवसर देंगी । इसमें जो जागे गा नई सुबह उसका स्वागत करे गी ।

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