लेखनी. (हिंदी ग़ज़ल)

कर्तव्य का ही बोध , कराती है लेखनी ।
इस देह को मनुृष्य , बनाती है. लेखनी ।
अंतर की वेदना न कवि क्यों मुखर करे ?
पथ-पथ पै नेह-पुष्प ,बिछाती है लेखनी ।
अंतर में उठे भाव को लिपिबद्ध करके देख,
अमरत्व के प्रभाव , लुटाती है लेखनी ।
वीणा ये देह की इसे गरिमायें कर प्रदान ,
मेधा के तार-तार , बजाती है लेखनी ।
सच्चाईयाँ जो धार के आए समाज में ,
अपने वतन का मान ,बढ़ाती है लेखनी ।
सीमायें लाँघते हैं ,यदि द्रोहियों के कृत्य,
लेकर कृपाण सामने ,आती है लेखनी ।
भगवान की अनुभूति को शब्दों में खींचकर,
भक्ति-रस का पान , कराती है लेखनी ।
कवियों की कल्पनायें हों या शायरों की नज्म़,
‘ईश्वर’ से उनका मेल , कराती है लेखनी ।

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