मुक्तक · Reading time: 1 minute

*लूट*

इंसा इंसा को लूट रहा
नश्वर माया ये कूट रहा
बेमानी हुए रिश्ते-नाते
डर ईश्वर का छूट रहा
*धर्मेन्द्र अरोड़ा*

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