लापरवाह माली

बेशक !
जिस तरह
खिलना चाहिए
उस तरह
अब नहीं,
खिल रही
हैं कलियाँ ।
फूलों की
मधुर गंध
से वंचित हैं,
आज गलियाँ।
इसलिए-नहीं
कि-बाग में
कोई माली
नहीं है,बल्कि
इसलिए-कि,
माली,माली की
तरह नहीं है ।
-ईश्वर दयाल गोस्वामी
कवि एवं शिक्षक ।

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