Apr 12, 2020 · कविता

लाकडाउन

सहमी ठहरी दुनिया की
तस्वीर देख रहा
हर शख्स
अपनी आंखों से ।

बाहर निकलता है जब
भीतर ही डर जाता है
कुदरत की
अदृश्य दहशत से ।

सोच रहा निस दिन
कब छूटेगा वो
लाकडाउन की
अनिश्चित कैदों से ।

मिट जाये अंधेरा पापों का
आशाओं के दीप जलाता
वो छज्जों
और चौबारों से ।।

राज विग 12.04.2020.

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Working as an officer in a PSU. vigjeeva@hotmail.com
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