” लहरों का किलोल , मन को भाता है ” !!

भीड़भाड़ हो ,
या तनहा हों !
सुख के पल हों ,
या दुखवा हो !
इन टूट रहे ,
तटबन्धों से !
सच दिल अपना –
जुड़ सा जाता है !!

रंग बिरंगे से ,
परिधान सजे !
तन मन उठती ,
ज्यों लहरें हैं !
गहरा अन्तस –
कई ज्वार उठे !
सागर से दिल का –
गहरा नाता है !!

गहराई पर ,
यों पहरे हैं !
अब गहरे जख्म ,
हुए गहरे हैं !
चाक कर रहे ,
सीना अब तो !
गहरापन ही सबको –
लहरा जाता है !!

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