लाल बिंदी ...

माथे पर मॉ लाल बिंदी लगाती थी
बस उसी से मॉ समर्पित दिखलाती थी
बिंदी के श्रंगार से उसका चेहरा झिलमिलाता था
बिन मेकअप के लालिमा जगाता था
मॉ के लिए बिंदी एक सम्मान थी
उसके नारीत्व का सम्मान थी
स्त्रीत्व की पहचान थी
पति के प्रति समर्पण की पहचान थी
बिंदी लगाकर मॉ ओज से लहकती थी
और आज की नारी को बिंदी न लगाने पर डपटती थी .
पर आज मॉ के माथे पर बिंदी नही है
क्यूकि पापा का हाथ उसके हाथो में नही है
आज वो एकदम उदास नजर आती है
चेहरे से वो गमगीन नजर आती है ..
एक बिंदी जब उसके माथे पे सजी थी
बेपनाह मुहब्बत के रिश्ते मे बंधी थी
पर आज न वो बिंदी है न ही उनका साथ है
भाव विह्वल उनकी ऑखे है
और सूने माथे का साथ ……

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