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लाल बिंदी …

NIRA Rani

NIRA Rani

कविता

October 1, 2016

माथे पर मॉ लाल बिंदी लगाती थी
बस उसी से मॉ समर्पित दिखलाती थी
बिंदी के श्रंगार से उसका चेहरा झिलमिलाता था
बिन मेकअप के लालिमा जगाता था
मॉ के लिए बिंदी एक सम्मान थी
उसके नारीत्व का सम्मान थी
स्त्रीत्व की पहचान थी
पति के प्रति समर्पण की पहचान थी
बिंदी लगाकर मॉ ओज से लहकती थी
और आज की नारी को बिंदी न लगाने पर डपटती थी .
पर आज मॉ के माथे पर बिंदी नही है
क्यूकि पापा का हाथ उसके हाथो में नही है
आज वो एकदम उदास नजर आती है
चेहरे से वो गमगीन नजर आती है ..
एक बिंदी जब उसके माथे पे सजी थी
बेपनाह मुहब्बत के रिश्ते मे बंधी थी
पर आज न वो बिंदी है न ही उनका साथ है
भाव विह्वल उनकी ऑखे है
और सूने माथे का साथ ……

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Author
NIRA Rani
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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